सोमवार, 27 अप्रैल, 2009 को 03:42 GMT तक के समाचार
श्रीलंका में एलटीटीई के संघर्षविराम का बहिष्कार कर चुकी श्रीलंका सरकार से नाराज़ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने अपना अनशन ख़त्म करने की घोषणा की है.
उधर श्रीलंका सरकार ने कोलंबो से जारी एक बयान में कहा है कि सेना का अभियान अब पूरा हो चुका माना जा रहा है और भारी हथियारों, बंदूकों का इस्तेमाल रोक दिया गया है.
राष्ट्रपति कार्यालय से जारी बयान में कहा गया है कि अब पहली प्राथमिकता युद्ध प्रभावित क्षेत्र में फंसे आम लोगों को बाहर निकालने और उनकी जान बचाने की है.
श्रीलंका सरकार के इस बयान के तुरंत बाद ही तमिलनाडु मुख्यमंत्री ने सोमवार की सुबह शुरू हुआ अपना अनिश्चितकालीन अनशन समाप्त कर दिया.
छह घंटे बाद ही अपना अनशन वापस लेते हुए उन्होंने बताया कि ऐसा वो केंद्र सरकार की ओर से मिले आश्वासन के बाद कर रहे हैं.
अनशन की वजह
श्रीलंका के उत्तरी हिस्से में तमिल विद्रोहियों और श्रीलंका सरकार के बीच निर्णायक संघर्ष चल रहा है पर वहाँ 50 हज़ार से भी ज़्यादा आम तमिल नागरिक फंसे हुए हैं.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव और अपीलों के बाद रविवार को एलटीटीई की ओर से संघर्षविराम की घोषणा कर दी गई थी पर श्रीलंका सरकार ने इस पेशकश को ठुकरा दिया था और संघर्ष जारी रखने की बात कही थी.
इससे क्षुब्ध तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि सोमवार की सुबह छह बजे तमिलनाडु की राजनीति के स्तंभ रहे अन्नादुरई की समाधि पर गए और अनिश्चितकालीन अनशन शुरू कर दिया.
उन्होंने अनशन शुरू करते हुए कहा, "एलटीटीई के संघर्षविराम के बावजूद राष्ट्रपति राजपक्षे ने लोगों को मारना बंद नहीं किया है. अगर वो तमिल नागरिकों को मार रहे हैं तो वो मुझे भी मार दें. श्रीलंका की सरकार वहाँ के तमिलों की ही तरह मेरी भी जान ले ले."
पार्टी और पारिवारिक लोगों का कहना है कि उन्होंने किसी से इस बारे में सलाह भी नहीं की और ख़ुद ही तमिलों के मुद्दे पर क्षुब्ध होकर अनशन करने का फैसला ले लिया.
केंद्र का आश्वासन
राज्य के मुख्यमंत्री और केंद्र में सत्तारूढ़ डीएमके नेता का अनशन राज्य के लोगों और देश के राजनीतिक गलियारों को स्तब्ध करने वाला था.
उनके अनशन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार अपनी ओर से सभी प्रयास कर रही है पर एक सीमा से अधिक किसी दूसरे देश की सरकार पर दबाव नहीं डाला जा सकता है.
पर इसके कुछ देर बाद ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने करुणानिधि से बातचीत की.
गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी करुणानिधि से बात की और कहा कि सरकार तमिल नागरिकों के हित में सभी ज़रूरी प्रयास करेगी.
बताया जा रहा है कि चिदंबरम से बातचीत में करुणानिधि को तमिल विस्थापितों के पुनर्वास जैसे कुछ आश्वासन भी मिले हैं. इन आश्वासनों के बाद ही करुणानिधि ने अपने अनशन को वापस लेने की घोषणा कर दी.
अनशन का असर
करुणानिधि की भूख हड़ताल ने राज्य और देश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है. विपक्षी दल जहाँ इस पलटवार से चौंके हुए थे वहीं करुणानिधि समर्थकों ने राज्य में कुछ स्थानों पर प्रदर्शन भी किए जिसके चलते यातायात व्यवस्था भी कहीं कहीं पर बाधित हुई.
बीबीसी की तमिल सेवा के संवाददाता थांगावेल अपाचे ने कहा कि इस अनशन के बाद करुणानिधि राजनीतिक रूप से भी अपने प्रतिद्वंद्वियों के सामने मज़बूत होकर सामने आए हैं. करुणानिधि के अनशन से जहाँ केंद्र सरकार पर और प्रभावी क़दम उठाने का दबाव बनेगा वहीं विपक्षी दलों पर यह करुणानिधि का पलटवार भी है.
पर विशेषज्ञों की राय में करुणानिधि ने जो काम अब किया है उसे उन्हें इस मुद्दे पर कुछ समय पहले ही कर देना चाहिए था. इससे करुणानिधि अपने पक्ष में एक राजनीतिक माहौल भी बना पाते और सियासी हलकों में दबाव भी.
चुनाव के दौर से गुज़र रहे भारत में तमिलनाडु राज्य की संसदीय सीटों के लिए 13 मई को मतदान होना है.
इस बार राज्य की राजनीति में श्रीलंकाई तमिलों का मुद्दा सबसे प्रमुखता से छाया हुआ है और विपक्षी नेता जयललिता सहित कई राजनीतिक मोर्चे करुणानिधि और उनकी पार्टी डीएमके को घेरते रहे हैं, उनकी आलोचना करते रहे हैं.
दो दिन पहले ही जयललिता ने यह कहकर श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे को और हवा दे दी कि उनकी पार्टी श्रीलंका के उत्तर में एक पृथक तमिल राष्ट्र की पक्षधर है.