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शुक्रवार, 24 अप्रैल, 2009 को 01:25 GMT तक के समाचार

आलोक कुमार
बीबीसी संवाददाता, बिहार से लौटकर

जातीय समीकरणों पर विकास की चोट

बिहार में इस बार हो रहे लोकसभा चुनावों में एक अहम बदलाव देखने को मिल रहा है. विकास मुद्दा बन कर उभरा है और इससे जाति आधारित वोटिंग पैटर्न को आघात पहुंचा है.

प्रचार के दौरान सभी राजनीतिक दलों के नेता विकास को नारा बना रहे हैं. राजनीतिक समीक्षकों की राय में इस बदलाव का श्रेय एक हद तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जाता है.

मुख्यमंत्री जन सभाओं में खुलेआम कह रहे हैं, "अगर काम से खुश नहीं हैं तो मुझे अगले विधानसभा चुनाव में दूध में मक्खी की तरह फेक दीजिएगा."

जनता और नेता दोनों इसे स्वीकार करते हैं. समस्तीपुर में पान की दुकान चलाने वाले रघुनाथ कहते हैं, "हम लोग तो उसी को वोट देंगे जो काम करता है. अब वो बात नहीं रही. जात-पात के आधार पर वोट नहीं मिलने वाला."

मुज़फ़्फ़रपुर के जोगनी गांव निवासी श्यामनंदन पासवान कहते हैं, "हम लोग अच्छी सड़क चाहते हैं, बिजली चाहते हैं. उम्मीदवार चाहे किसी दल का हो, वोट उसी को देंगे जो काम करेगा."

हालाँकि सभी लोग इससे सहमत नहीं हैं. बेतिया के गोपालकृष्ण कहते हैं, "अभी ये नारा तो ठीक लगता है लेकिन जब बटन दबाने की बारी आएगी तो जात-पात का असर फिर दिखेगा. हाँ इतना ज़रूर है कि ऐसी सोंच रखने वाले लोगों की संख्या घटी है. अब सभी जाति में आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जो विकास के नाम पर मतदान करेंगे और उनके लिए उम्मीदवार की जाति अहम नहीं है."

सामाजिक न्याय से विकास तक

बिहार के सामाजिक-आर्थिक मामलों के जानकार शैबाल दास गुप्ता कहते हैं, "विकास नया राजनीतिक एजेंडा बन कर उभरा है. 1991 के बाद सामाजिक न्याय के सियासी एजेंडे पर राजनीति आधारित रही. पिछले बीस साल से राजनीति की धुरी यही थी."

ये दौर बिहार में लोकतंत्रीकरण के विकेंद्रीकरण का रहा जिसमें पिछड़े और दलित वर्गों को ताकत मिली और वो सत्ता के केंद्र में आ गए.

शैबाल गुप्ता कहते हैं, "लेकिन ये बदलाव पूरा हो चुका है और पूरे हिंदुस्तान में ये हुआ है कि सामाजिक बदलाव के बाद विकास ही एजेंडा बना है."

ये पूछने पर कि नीतीश सरकार के कार्यकाल में विकास के क्या मानक हैं, वो कहते हैं, "नीतीश सरकार ने कई काम किए, लेकिन इसका कोई मानक तय नहीं कर सकते जैसा कि गुजरात, आंध्र या महाराष्ट्र के साथ है. मुख्य चीज़ हुई है गवर्नेंस. शासकीय कुशलता बहाल करने की दिशा में प्रगति हुई है."

उनका कहना है, "सड़कें बन रही हैं. कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास हुए हैं जिसका असर अगले दो वर्षों में बता रहेगा. इस सरकार ने आज़ादी के बाद पहली बार भू-सुधार आयोग गठित किया और जिसने रिपोर्ट तैयार कर दी है."

किसी की हां-किसी की ना

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक जनसभा में कहते हैं , "लोग पहले जाति की बात करते थे, आज विकास की बात करते हैं. इससे बड़ा बदलाव क्या हो सकता है."

वो कहते हैं, "पटना और मुज़फ्फ़रपुर में लड़कियां बाहर निकलने से डरती थी, अब साइकल से स्कूल जाती हैं. इससे बड़ा बदलाव क्या होगा. ये सुविधा सबको मिल रही है. किसी जाति की हो. कहीं सड़क बन रही है, कहीं पुलिया बन रही है, हर तरफ़ विकास का काम हो रहा है."

कांग्रेस में शामिल हुए साधु यादव, लोक जनशक्ति पार्टी के रामचंद्र पासवान और प्रकाश झा, जनता दल युनाईटेड के वैशाली से प्रत्याशी मुन्ना शुक्ला, दरभंगा से राजद उम्मीदवार मोहम्मद फ़ातमी समेत लगभग सभी प्रत्याशी स्वीकार करते हैं कि चुनाव में मुख्य मुद्दा विकास का है.

हालाँकि राजद के टिकट पर वैशाली से लड़ रहे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह कहते हैं कि सिर्फ़ विकास के मुद्दे पर चुनाव जीतना मुश्किल है.

वो कहते हैं, "अगर ऐसा होता तो मेरे क्षेत्र में सारे वोट मुझे ही मिल जाते. कहीं जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. विकास मुद्दा ज़रूर है लेकिन बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है."

किस हद तक..

स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक सुरेंद्र किशोर कहते हैं, "विकास के साथ-साथ शासकीय व्यवस्था में जनता का विश्वास भी बड़ा मुद्दा है. अपहरण, हत्या में आई कमी और कुल मिलाकर सुरक्षित होने का एहसास जनता की सोंच में भी बदलाव लाई."

वो कहते हैं, "सत्तारुढ़ जदयू-भाजपा गठबंधन ने छह उपचुनाव जीते हैं. इससे पता चलता है कि विकास का मुद्दा काम कर रहा है. विकास और गर्वनेंस पुराने मुद्दों पर हावी हो रहे हैं."

लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जेहन में भी जातीय समीकरणों की छाया है. इसका एक उदाहरण है महादलित आयोग का गठन.

इसके बारे में सुरेंद्र किशोर कहते हैं, "उनकी कोशिश जातीय वोट बैंक को तोड़ने की है. पहले जिन दलों ने कुछ समीकरण बनाए उसमें भी कुछ ख़ास जाति के लोगों को ही फ़ायदा मिला तो अब नीतीश ने इसका दायरा बढ़ाने की कोशिश की है. मतलब दोहरी रणनीति, विकास के साथ-साथ पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों का समर्थन पाने की कोशिश हो रही है."

इस बदलाव को सकारात्मक बताते हुए वो कहते हैं, "मुझे लगता है अब लालू यादव हों या राम विलास पासवान सभी विकास को आगे रख रहे हैं. ये बिहार के लिए अच्छी बात है. सरकार किसी की हो विकास पर ज़ोर रहेगा क्योंकि सबको पता हो गया है कि जातीय समीकरण निर्णायक नहीं रहने वाले."

जातीय समीकरणों पर विकास के हथियार ने कितना चोट किया है, इसका अंदाज़ा चुनाव परिणामों से लगाया जा सकेगा.