अंबरासन एतिराजन
बीबीसी संवाददाता, कोलंबो
तमिल विद्रोहियों का कहना है श्रीलंका सरकार ने 48 घंटे के लिए जो संघर्ष विराम की घोषणा की है वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को धोखा देने का एक प्रयास है.
एक बयान जारी कर तमिल विद्रोहियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की देखरेख में स्थायी संघर्ष विराम की बात की है.
रविवार को श्रीलंका सरकार ने तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अभियान को 48 घंटे के लिए रोकते हुए पूर्वोत्तर में अस्थायी संघर्षविराम की घोषणा की थी.
तमिल विद्रोहियों का कहना है कि दशकों से जारी ख़ून ख़राबे को ख़त्म करने के लिए वो राजनीतिक वार्ता के लिए तैयार हैं.
विद्रोहियों का कहना है कि दो दिन का संघर्ष विराम 'महज आँखों में धूल झोंकने की कार्रवाई थी'.
उनका कहना है कि एक अंतरराष्ट्रीय समुदाय की देखरेख में संघर्ष विराम हो और इसके तहत राजनीतिक समाधान की भी बात हो.
विद्रोहियों के बयान के मुताबिक, " एलटीटीई लंबे अरसे से एक ऐसी स्थायी संघर्ष विराम की अपील करता रहा है जिसमें सैन्य और राजनीतिक बातें शामिल हों. एलटीटीई इसे अब भी दोहराता है."
विद्रोहियों का कहना है कि एक स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए सौहार्दपूर्ण माहौल बनाना भी इस संघर्ष विराम में शामिल हो.
विद्रोहियों ने आरोप लगाया है कि सेना ने अस्थायी संघर्ष विराम के पहले दिन नागरिकों के ठिकानों पर गोलाबारी की. हालांकि सेना ने इस आरोप को ख़ारिज किया है.
नागरिकों की चिंता
एक आकलन के मुताबिक पूर्वोत्तर श्रीलंका में लड़ाई के कारण 70 हज़ार से दो लाख आम नागरिक फंसे हुए हैं. सोमवार को सिर्फ़ 18 लोग ही इससे बाहर आ पाए.
सेना का आरोप है कि विद्रोही आम नागरिकों को उनकी इच्छा के विरुद्ध रोके हुए हैं जबकि विद्रोहियों का दावा है कि लोग सेना की डर से उस इलाक़े से नहीं जाना चाह रहे हैं.
इस बीच ब्रिटेन के विदेश मंत्री डेविड मिलीबैंड ने श्रीलंका सरकार से अपील की है कि दो दिन के संघर्ष विराम की समाप्ति के बाद वे फिर से विद्रोहियों के ख़िलाफ़ पूरी तरह मोर्चा न खोलें.
राहत एजेंसियों का दावा है कि संघर्ष के दौरान बड़ी संख्या में आम नागरिक मारे गए हैं और घायल भी हुए हैं.
संयुक्त राष्ट्र की बाल संस्था यूनिसेफ़ ने भी कहा है कि श्रीलंका में सेना और तमिल विद्रोहियों के बीच संघर्ष के कारण सैकड़ों बच्चे मारे गए हैं.
वर्ष 1983 से श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों के साथ सेना के संघर्ष में लगभग 70 हज़ार लोग मारे गए हैं.