रविवार, 12 अप्रैल, 2009 को 07:20 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, आज़मगढ़ से
आतंकवाद का सवाल पिछले एक साल में जिस स्तर पर देशभर में उठा, वैसा पहले शायद कभी नहीं रहा. पर यह कह पाना शायद मुश्किल है कि कोई लोकसभा क्षेत्र केवल इसी मुद्दे पर वोट देता नज़र आ रहा है.
कई राजनीतिक, जातीय और सांप्रदायिक समीकरणों पर वोट दे रहे इस देश में लेकिन आज़मगढ़ लोकसभा सीट पर 'आतंकवाद' ही चुनाव का सबसे प्रमुख मुद्दा है.
चुनावी दंगल में जहाँ जातियाँ, नीतियाँ और प्रत्याशियों की छवि निर्णायक जनाधार जुटाती हैं, वहीं आज़मगढ़ में 'आतंकवाद' के नाम पर परेशान किया जाना, 'आतंकवाद' से आज़मगढ़ का नाम जोड़ा जाना और 'आतंकवाद' को ख़त्म किया जाना प्रमुख मुद्दे हैं.
पिछले साल जयपुर, दिल्ली में हुए बम विस्फोटों और दिल्ली के बटला हाउस इलाक़े में पुलिस मुठभेड़ की घटना के बाद से आज़मगढ़ का नाम एकाएक देशभर में चर्चा में आ गया.
आज़मगढ़ के गाँवों से पिछले दो बरसों में दर्जन भर युवाओं को हिरासत में लिया जा चुका है. इन पर आरोप लगा है कि ये चरमपंथी कार्रवाइयों में शामिल थे.
आज़मगढ़ की 32 लाख से ऊपर की आबादी में एक बड़ी संख्या मुसलमानों की है. वहाँ हिंदू समुदाय में यादव जाति और ठाकुर जाति के लोग ज़्यादा हैं.
मुस्लिम समुदाय की तकलीफ़
मुस्लिम परिवारों के ही युवाओं पर चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप इस बिरादरी के लिए तकलीफ़देह रहा.
आज़मगढ़ से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी अकबर अहमद डंपी कहते हैं, ''आज़मगढ़ के मुसलमानों को बिना सबूतों के आतंकवाद से जोड़ देना एक राजनीतिक साजिश के तहत हो रहा है. मैंने इसके लिए लगातार आवाज़ उठाई है और आगे भी उठाऊंगा.''
उधर भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी रमाकांत यादव का कहना है कि दाऊद और अबू सलेम जैसे अंडरवर्ल्ड माफ़िया के नाम से पहले ही आज़मगढ़ बहुत बदनाम हो चुका है. वे कहते हैं इस बार ताज़ा गिरफ़्तारियों ने पूरी आज़मगढ़ की छवि को धूमिल किया है और इसे आज़मगढ़ के लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे.
भाजपा के प्रचार में जुटे कार्यकर्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि चंद लोगों और एक बिरादरी की वजह से पूरा आज़मगढ़ क्यों बदनाम हो, इसलिए इस ज़िले से 'आतंकवाद' या उससे जुड़े लोगों, नेताओं को उखाड़ फेंकने की ज़रूरत है.
स्थानीय मतदाता मोहम्मद तारिक़ कहते हैं, “जिन परिस्थितियों में आज़मगढ़ के मुसलमान को पहुँचा दिया गया है, उसके बाद अब हमारे लिए विकास या बाकी के कामों से बड़ा मुद्दा अपने को सुरक्षित करना है.”
एक अन्य मतदाता आसिफ़ मोहम्मद कहते हैं, “आज़मगढ़ को आतंक का गढ़ कहने वालों को कोई रोक नहीं रहा है. मीडिया भी उन्हीं के सुर में सुर मिला रही है. ऐसे में हम पहले अपनी युवा पीढ़ी को बचाएंगे जिनपर बेवजह के इल्ज़ाम लगाकर उन्हें बंद किया जा रहा है.”
उलेमा काउंसिल
दिल्ली में जामिया एनकाउंटर के बाद आज़मगढ़ में जो आक्रोश मुसलमानों में पैदा हुआ था, उसका नतीजा है क्षेत्रीय स्तर पर सिर उठा रही पार्टी - उलेमा काउंसिल.
उलेमा काउंसिल ने डंपी और बसपा के दावे को दरकिनार कर ज़िले के एक प्रतिष्ठित चिकित्सक जावेद अख़्तर को टिकट दिया है.
डॉक्टर जावेद कहते हैं, "उलेमा काउंसिल ही यहाँ के भयभीत मुसलमानों को न्याय दिलाने की दिशा में सच्चाई से काम करेगी."
वहीं समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी दुर्गा यादव की ओर से भी दोहराया जा रहा है कि उनकी पार्टी ही मुसलमानों के हितों पर ध्यान देती रही है.
हालांकि ज़िले में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने मुख्य रूप से दलितों, पिछड़ों और ग़रीबों के हितों की ही बात रखी पर यह कहने से नहीं चूकीं कि उनकी पार्टी और सरकार संप्रदाय के आधार पर लोगों को परेशान करने के ख़िलाफ़ रही है और ऐसा होने नहीं देगी.
जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की छाप यहां के चुनाव पर भी है पर 'आतंकवाद' सबसे ऊपर है. एक बड़ा मतदाता वर्ग अपनी राय बनाने में इसी मुद्दे को प्रमुखता दे रहा है.
चाहे ऐसा राजनीतिक दलों की ओर से प्रेरित किए जाने के कारण हो, या फिर अपनी जाति, बिरादरी की आपबीतियों के कारण.
मतदाता अपने-अपने मन को बनाते समय दुविधा में भी हैं. दुविधा यह कि जिस प्रत्याशी को वे संसद भेजना चाह रहे हैं, क्या वाकई वह इस मुद्दे पर कुछ प्रभावी कर पाने की स्थिति में होगा?
जातीय समीकरण
आज़मगढ़ में मुख्य रूप से मुस्लिम, यादव और क्षत्रिय मतदाता ही ज़्यादा बड़ी तादाद में हैं. इसके बाद ब्राहम्ण और हरिजन आते हैं. यहाँ से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार जीतते रहे हैं. फिलहाल बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अक़बर अहमद इसी पार्टी से जीतकर पिछले उप चुनाव में संसद पहुंचे थे.
दूसरी ओर बाहुबली कहे जाने वाले रमाकांत यादव ने समाजवादी पार्टी से अपने राजनीतिक सफ़र की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने बसपा का दामन थामा, दो बार चुने गए पर 2004 चुनावों में जीत के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी से नाता फिर जोड़ लिया.
चुनाव से ठीक पहले उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा है. उनके लिए क्षत्रियों का वोट जुटाने के लिए आज़मगढ़ में जन्मे समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह के भाई भाजपा के लिए वोट मांगते नज़र आ रहे हैं.
आज़मगढ़ से बसपा के लिए रास्ता आसान समझा जा रहा था. अभी भी बसपा मज़बूत स्थिति में दिखती है पर मानवाधिकार कार्यकर्ता तारिक़ मोहम्मद बताते हैं कि इन चुनावों में उलेमा काउंसिल की ओर से एक प्रतिष्ठित और साफ़ छवि वाले प्रत्याशी के आने से बसपा के लिए रास्ता कठिन हो जाएगा.
दरअसल, उलेमा काउंसिल ने बसपा को अक़बर अहमद के नाम पर मिलने वाले मुस्लिम वोट में सेंध लगा दी है जो कि चुनाव के नतीजे को बहुत हद तक प्रभावित कर सकती है.
वहीं दुर्गा यादव मुस्लिम वोटों में समाजवादी पार्टी से होने के कारण कुछ हिस्सेदारी है. यादव वोट भी उन्हें मिलेगा. उनकी मज़बूती रमाकांत यादव और डंपी, दोनों के लिए महंगी पड़ सकती है.
पर भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रचार कर रहे लोगों और हिंदु मतदाताओं के मन की टोह लेने पर पता चलता है कि बसपा प्रत्याशी को मज़बूत स्थिति में पाने के बाद ध्रुवीकरण तय है और ऐसे में हिंदू वोट में एक अच्छी तादाद रमाकांत यादव की झोली में जा सकती है.