रविवार, 12 अप्रैल, 2009 को 07:43 GMT तक के समाचार
रेहान फ़ज़ल
बीबीसी संवाददाता, आज़मगढ़ से
नज़र मंज़िल पर है तो मील के पत्थर नज़र नहीं आते. पाँच साल तक आराम करने के लिए अगर महीने भर काँटो पर भी सोना पड़े तो मंज़ूर है.
बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती सिर्फ़ चार घंटे सोती हैं. सुबह पाँच बजे से शुरू होता है उनका दिन. 18 घंटे चुनाव प्रचार और सिर्फ़ चार घंटे आराम.
आज़मगढ़ के पीएसी ग्राउंड पर तक़रीबन 50 हज़ार लोगों का मजमा जमा है. मायावती को सुबह 11 बजे आना है. दोपहर के एक बजने को हैं, लेकिन फिर भी चिलचिलाती धूप में लोग अपनी जगह से टस से मस नहीं.
आज़मगढ़ से बीएसपी के उम्मीदवार अकबर अहमद डंपी अपने भाषण में हुंकार भर रहे हैं कि बहन जी को प्रधानमंत्री बनाना है. उनका जोशीला भाषण जारी है लेकिन अचानक आसमान में हेलिकॉप्टर का शोर गूँजता है और नीचे उतरते उतरते धूल का एक गोला अपने पीछे छोड़ते हुए मंच से सिर्फ़ दस गज़ की दूरी पर उतरता है.
यूँ तो मायावती हेलिकॉप्टर से उतरकर महज 30 सेकंड में चहलक़दमी करते हुए मंच तक पहुँच सकती हैं, मगर नहीं वो कार से मंच तक जाना पसंद करती हैं.
मंच पर रखी एक सिंहासन जैसी कुर्सी पर मायावती अकेले बैठती हैं अगल बगल कोई नेता नहीं. अगर किसी को खड़ा होना है तो कुर्सी से दो गज़ दूर.
अब बारी है नारे लगाने वालों की, उनमें होड़ मच जाती है. और नारे शुरू हो जाते हैं. मायावती अपने हाथ के इशारे से उन्हें रुकने के लिए कहती हैं. बड़ी ख़ुश नज़र आती हैं.
इसी बीच एक युवक मंच पर माइक संभाल कर मायावती के कसीदे बयान करने शुरू कर देता है.
बहन जी की शान में लिखा गया एक गीत पेश किया जाता है. बहन जी एक नक़ली से मुस्कान से अपनी झेप मिटाने की कोशिश कर रही हैं और साथ ही अपनी घड़ी भी देख रहीं हैं. मानो कह रही हों, बस कर भाई अभी और कई जगह जाना है.
सिर्फ़ भाषण
बहन जी माइक पर आ गई हैं अपने पहले से लिखे भाषण के साथ और शुरू हो जाती हैं... “हमारी सरकार ने प्रदेश में किसी को भी क़ानून के साथ खिलवाड़ नहीं करने दिया चाहे वो गांधी परिवार का बेटा हो या फिर किसी राजा महाराजा का बेटा..."
चूंकि भाषण लिखा हुआ है इसलिए नज़रें लोगों की तरफ़ कम और डाइस पर रखे काग़ज़ पर ज़्यादा है.
बीच बीच में ज़ोर देने के लिए एक बार लोगों की तरफ़ हाथ हिलाती हैं और फिर पढ़ना शुरू कर देती हैं.
भीड़ में इतना शोर है कि लोगों को उनकी आधी बातें समझ ही नहीं आ रही हैं, लेकिन मजाल है कि एक तिनका भी हिल जाए.
मायावती अपने भाषण के अंतिम हिस्से पर पहुंचती हैं. पॉयलट को इसका अंदाज़ा हो गया है, हेलिकॉप्टर के पंखे चलने शुरू हो गए हैं.
मायावती एक बार फिर तेज़ी से उतरकर कार में सवार होती हैं, धूल का सैलाब उड़ाते हेलिकॉप्टर में बैठने के लिए और रवाना हो जाती हैं अपनी अगली मंज़िल की तरफ़.
मायावती की सोशल इंजीनियरिंग पर भले ही सवाल उठने शुरू हो गए हों.
मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश में वापसी के लिए जितने लालायित हों या भारतीय जनता पार्टी अजित सिंह के साथ समझौता करके चुनावी गणित को प्रभावित करने की भरपूर कोशिश कर रही हो लेकिन मायावती की राजनीतिक 'ठसक' अब भी बरक़रार है और वो इसे दिखाना भी चाहती है.