बुधवार, 01 अप्रैल, 2009 को 12:39 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
आज सुबह सुबह कानपुर में घाटमपुर से एक नेत्रहीन सामाजिक कार्यकर्ता रामकिशुन गुप्ता का फोन आया. वह बोले मैं कभी अपनी राजनीतिक विचारधारा नहीं बताता. लेकिन आज मै आपको बता रहा हूँ.
वो बोले जिस तरह से ' ज़रा सी बात पर वरुण गांधी पर रासुका लगाया वह ठीक नही है.' राम किशुन गुप्ता का तर्क था अगर वरुण गांधी ने एक बात कही भी तो इसके लिए इतनी बड़ी सज़ा, जबकि दूसरे लोग आतंकवाद और देशद्रोह की बात करते हैं तो कुछ ध्यान नहीं दिया जाता.'
तकनीकी तौर पर रासुका में नज़रबंदी अपने आप में कोई आपराधिक दंड नहीं है, पर राम किशुन गुप्ता और उनके जैसे तमाम लोग इस क़दम से उद्वेलित हैं और अपने अपने ढंग से प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
देश में जब आम चुनाव हो रहे हों तो आम आदमी के लिए सबसे आसान प्रतिक्रिया होती है अपनी भावना को वोटिंग मशीन के ज़रिए व्यक्त करना.
थोड़ा पीछे इतिहास में चलें तो मुझे तीस अक्तूबर 1990 याद आता है, जब विश्व हिन्दू परिषद के अयोध्या कूच को रोकने के लिए तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार ने परिक्रमा पर रोक लगा दी थी. इस क़दम से ऐसे तमाम लोग भी उद्वेलित हो गए थे जो वैसे बाबरी मस्जिद के ख़िलाफ़ राम मंदिर आन्दोलन में शामिल नहीं थे.
पीलीभीत के घटनाक्रम पर नज़र डालें तो ये बात याद रखने की है कि वरुण गांधी की माँ मेनका गांधी चार बार से वहां से सांसद हैं. मेनका पहले जनता दल से , फिर निर्दलीय और पिछली बार बीजेपी से जीतीं.
मेनका ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ वरुण गांधी जैसा भड़काऊ भाषण नहीं दिया था. और समाजवादी पार्टी के जिस प्रत्याशी रियाज़ अहमद के बहाने वरुण ने यह भाषण दिए वह संजय विचार मंच में रह चुके हैं.
रणनीति में बदलाव
पीलीभीत में कई लोगों ने मुझे बताया कि शुरू में वरुण गांधी पीलीभीत के विकास के नाम पर वोट मांग रहे थे.
लेकिन लोगों ने सवाल पूछा कि जब बीस सालों में आपकी माँ ने विकास नहीं किया तो आप क्या करेंगे. कहते हैं कि उसके बाद उन्होंने रणनीति बदली.
पीलीभीत शांत ज़िला रहा है. मिलीजुली आबादी वाला. यहाँ के बड़े मुस्लिम नेताओं ने भारत विभाजन और पकिस्तान निर्माण का विरोध किया था. विभाजन के बाद बड़ी तादाद में हिन्दू सिख शरणार्थी यहाँ पाकिस्तान से आकर बसे हैं. पीलीभीत को मिनी पंजाब भी कहते हैं और इसीलिए मेनका गांधी दिल्ली से पीलीभीत आई थीं.
बहरहाल बदली रणनीति के तहत वरुण गाँधी ने सात और आठ मार्च को काफ़ी कड़वी ज़बान में मुसलामानों के ख़िलाफ़ भाषण दिया. लेकिन स्थानीय लोगों ने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.
स्थानीय मुस्लिम प्रतिक्रिया
स्थानीय मुस्लिम नेताओं का कहना है कि वरुण के भाषण पर आंदोलित होने का हक़ हमको था लेकिन उसकी नादानी को हमने नज़रअंदाज किया ताकि माहौल ख़राब न हो. ऐसे भाषण बहुत से लोग देते रहते हैं. हिन्दू भी और मुसलमान भी.
पुलिस ने वरुण के भाषण की रिपोर्ट प्रशासन को दी. होली शांति से निबट जाए इसलिए प्रशासन ने भी मामले को तूल देना ठीक नहीं समझा.
मुस्लिम नेता पूछ रहे हैं कि फिर रिश्ते में वरुण के मामा, एक वकील और कांग्रेस नेता वीएम सिंह को क्या पड़ी थी कि उन्होंने भाषण की शिकायत चुनाव आयोग से की. वीएम सिंह ने ही मिडिया को यह सीडी दी.
उसके बाद क्या हुआ सबको पता है. आयोग ने ज़िला कलक्टर और कप्तान का तबादला करके उनके दो मातहतों को निलंबित कर दिया और नए अफ़सर भेजकर कमान सीधे अपने हाथ में ले ली.
रासुका
आयोग के आदेश पर वरुण के ख़िलाफ़ एक नया मुक़दमा लिखा गया. आयोग ने अपने अधिकार से बाहर जाकर भाजपा को सलाह दे डाली कि वह वरुण को अपना प्रत्याशी न बनाए.
भाजपा ने आयोग पर कांग्रेस के दबाव में काम करने का आरोप लगाया. वरुण ने सी डी में छेड़खानी का आरोप लगाया लेकिन अपने को हिन्दुत्ववादी बताने में संकोच नहीं किया.
उत्तर प्रदेश पुलिस का कहना था कि अभी जांच चल रही है इसलिए क़ानूनन उसको गिरफ़्तार करने की ज़रूरत नहीं है.
मगर जेल जाने से डरे वरुण ने एक साथ दिल्ली और इलाहाबाद हाईकोर्ट से गुहार लगाकर गिरफ़्तारी पर रोक और मुक़दमा ख़ारिज करने की मांग की. पर अदालत ने साफ़ कर दिया कि क़ानूनन पहली नज़र में मामला गंभीर दिखता हैं और वह पुलिस मामलों में हस्तक्षेप नही करेगी.
वरुण ने फिर रणनीति बदली और स्वयं पीलीभीत जाकर कोर्ट में आत्मसमर्पण का निर्णय किया. लोगों को आश्चर्य है कि मायावती सरकार ने वरुण को शांति भंग करने की आशंका में रास्ते में ही गिरफ़्तार क्यों नही किया.
समर्थन
वैसे तो बीजेपी ने अपने को वरुण गांधी के विवादास्पद भाषण से असंबद्ध किया पर साथ ही कलराज मिश्र को पीलीभीत भेजा और बड़ी तादाद में बाहर से अपने समर्थकों को भेजा. उस दिन पीलीभीत की सड़कों पर वहाँ जो उपद्रव हुआ वह सबने देखा.
वरुण अदालत में आत्म समर्पण के लिए पेश हुए जबकि पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ कोई मामला तब तक नहीं भेजा था. कोर्ट के पास विकल्प था कि वह पुलिस से रिपोर्ट मांग कर अगली तारीख़ तय करती. लेकिन कोर्ट ने वरुण के शपथ पत्र के आधार पर वरुण को दो दिन के लिए जेल भेज दिया.
इसका सजीव प्रसारण टीवी पर छाया रहा और तमाम हिन्दुत्ववादी लोगों वरुण गांधी की सहानुभूति बढाते रहे. आडवाणी जी, नरेन्द्र मोदी, उमा भारती, योगी आदित्य नाथ, विनय कटियार और ऋतंभरा जलें तो जला करें. पर राजनाथ सिंह और उनका ख़ेमा ख़ुश है क्योंकि उत्तर प्रदेश से बीजेपी की सीटें बढ़ी तो उनका क़द बढ़ेगा.
मायावती का क़दम
अब बारी मायावती की थी. मुस्लिम वोट के लिए कांग्रेस ने वरुण गांधी के ख़िलाफ़ शिकायत की थी. मायावती ने आगे जाकर वरुण गांधी को रासुका में नज़रबंद कर दिया, हालांकि पहले मुक़दमे में न्यायिक हिरासत बढ़वाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली.
ऐसा इसलिए किया ताकि प्रशासन वरुण गांधी कि सुरक्षा के नाम पर उसे कहीं किसी और जेल में ले जा सके. और फिर वरुण गांधी को रातोंरात एटा जेल भेज दिया.
एटा से कल्याण सिंह निर्दलीय प्रत्याशी हैं, पर समाजवादी पार्टी के समर्थन से . लोध बाहुल होने से कल्याण सिंह एटा को अपना गढ़ मानते हैं मगर मायावती ने वरुण के बहाने हिन्दुत्ववादी ताक़तों को एटा की तरफ़ मोड़ दिया है.
हिंदुत्ववादी संगठनों को फिर से नया हीरो वरुण गाँधी मिल गया है. उनके सब पुराने हीरो उन्हें निराश कर चुके हैं. आडवाणी जिन्नाह की मज़ार पर जाकर और कल्याण सिंह मुलायम से हाथ मिलाकर.
अब मुलायम ख़ेमे में बेचैनी है. स्वयं मुलायम ने वरुण पर रासुका का विरोध करके मायावती पर बीजेपी को फ़ायदा पहुँचाने का आरोप लगाया है.
समाजवादी पार्टी के नेता कह रहे हैं कि मंडलवादी ताक़तें एकत्र हो रही हैं तो बीजेपी और बीएसपी उसे रोकने के लिए हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेल रही हैं.
माया के सलाहकार सतीश मिश्र इसे मुलायम और भाजपा की मिलीभगत का सुबूत बता रहे हैं. वरुण के ख़िलाफ़ मुहिम की पहल करने वाली कांग्रेस एक बार फिर इस मसले पर भ्रमित दिख रही है. चुनाव आयोग भी खामोश हो गया है.
शुक्रगुज़ार होना चाहिए
वरुण को सबका शुक्रगुज़ार होना चाहिए. इतने दिनों में वरुण मेनका गांधी के बेटे से नेता बन गए और जेल का डर भी ख़त्म हो गया.
चचेरे भाई राहुल अभी भी अंडर ट्रेनिंग हैं. कानपुर में माता सोनिया के एलान के बावजूद अभी तक माया सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन कर जेल जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए.
वरुण को सबका शुक्रगुज़ार होना चाहिए. पर यह भी याद रखना चाहिए कि नफ़रत की राजनीति बहुत लंबी दूरी तक नही ले जाती.