शनिवार, 14 मार्च, 2009 को 19:08 GMT तक के समाचार
गुरुवार को तीसरे मोर्चे के नेताओं की कर्नाटक में हुई रैली के बाद उनकी राजनीतिक गतिविधियाँ अब राजधानी दिल्ली को गरमाने लगी है.
रविवार को वाममोर्चे के सभी दल यानी सीपीएम, सीपीआई, आरएसपी और फॉर्वर्ड ब्लॉक की बैठक होने वाली है और इसके बाद वाममोर्चे के नेता तीसरे मोर्चे के दूसरे नेताओं से मिलेंगे.
इसमें टीडीपी, टीआरएस, एआईडीएमके, जेडीएस और बीजेडी के नेताओं के होने की संभावना है.
फिर शाम को बीएसपी की नेता और उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने तीसरे मोर्चे के नेताओं को रात्रिभोज पर आमंत्रित किया है.
हालांकि मायावती की ओर से सफ़ाई दी गई है कि इस भोज का कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है.
इस बीच कांग्रेस और बीजेपी ने एक बार फिर तीसरे मोर्चे के अस्तित्व और भविष्य पर सवालिया निशान लगाया है.
रात्रिभोज राजनीति
बीएसपी प्रमुख मायावती के रात्रिभोज में वाममोर्चे में शामिल चारों वामपंथी दलों के नेता, टीडीपी, टीआरएस, एआईडीएमके, जेडीएस और हरियाणा जनहित कांग्रेस के नेता आमंत्रित हैं.
गुरुवार को कर्नाटक की रैली से दूर रहे बीजू जनतादल के भी इस रात्रि भोज में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है.
हालांकि इस मोर्चे में नेतृत्व को लेकर तस्वीर साफ नहीं है.
माना ये जा रहा था कि मायावती के आवास पर रात्रिभोज का आयोजन भी बीएसपी ने इसीलिए किया है ताकि प्रधानमंत्री पद पर मायावती की दावेदारी पर तीसरे मोर्चे के नेता कोई आश्वासन दे दें.
लेकिन इससे पहले ही वामदलों की ओर से स्पष्ट कर दिया गया है कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुनावों के बाद ही तय किया जाएगा.
और मायावती की ओर से एक बयान जारी करके यह साफ़ किया गया है कि उन्होंने तीसरे मोर्चे की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की बात कभी नहीं कही थी.
विश्लेषकों का कहना है तीसरे मोर्चे के बारे में जिस तरह से कांग्रेस और बीजेपी के नेता बयान दे रहे हैं उससे साफ़ है कि ये दोनों ही पार्टियाँ इस मोर्चे की राजनैतिक हैसियत को बेहद गंभीरता से महसूस कर रही हैं.
यहाँ तक कि यूपीए में शामिल कुछ दलों के नेताओं ने भी तीसरे मोर्चे को गंभीरता से लेने की सलाह दी है.
कांग्रेस-भाजपा ख़िलाफ़
हमेशा की तरह कांग्रेस और बीजेपी ने तीसरे मोर्चे के अस्तित्व और भविष्य पर सवालिया निशान लगाया है.
तीन दिन पहले ही तीसरे मोर्चे का गठन हुआ और उसी समय से कांग्रेस और बीजेपी ने उस पर नकारात्मक टिप्पणियां शुरू कर दीं.
मोर्चे के गठन पर शनिवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बेहद चुटीले अंदाज़ में टिप्पणी की और कहा, "ये कौन तय करेगा कि कौन पहला मोर्चा है कौन दूसरा है और कौन तीसरा है."
मुखर्जी का कहना था कि अगर इस मोर्चे के नेताओं का मक़सद गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेस सरकार बनाना है तो कोई दिक़्क़त नहीं है लेकिन इतिहास देखा जाए तो इस तरह का मोर्चा कभी सफल नहीं हो सका.
लेकिन मुखर्जी के इस बयान पर वामदलों का कहना था कि तीसरे मोर्चे की असफलता के लिए कांग्रेस ही ज़िम्मेदार रही है.
उधर बंगलोर में बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने भी तीसरे मोर्चे पर जमकर प्रहार किया.
उनका कहना था, "तीसरा मोर्चा एक छलावा है. इसकी न तो कोई विश्वसनीयता, न तो कोई स्वीकृति है और न ही इसके पास कोई नेता है."