शनिवार, 07 फ़रवरी, 2009 को 04:28 GMT तक के समाचार
उमर फ़ारूक़
बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद
एक ऐतिहासिक फ़ैसले में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के पाँच सदस्यों की खंडपीठ ने कहा है कि पुलिस मुठभेड़ के हर मामले से संबंधित पुलिस अधिकारियों का नाम सार्वजनिक होना चाहिए.
अदालत ने कहा है कि मुठभेड़ के मामलों में पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी यानी एफ़आईआर दर्ज होनी चाहिए और हर मामले की जाँच होनी चाहिए ताकि इस बात की पुष्टि हो सके कि पुलिस का गोली चलाना और किसी को मार देना जायज़ था या नहीं.
आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट की इस खंडपीठ की अध्यक्षता न्यायधीश एआर दवे कर रहे थे जिन्होंने नागरिक अधिकार संगठनों की एक जनहित याचिका पर ये फ़ैसला सुनाया.
ये संगठन राज्य में कई माओवादियों की मुठभेड़ों में मौत के बाद पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग कर रहे थे.
पहले ये याचिका एक जज के सामने आई थी लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे तीन जजों की खंडपीठ को सौंप दिया गया. लेकिन जब तीन जजों की खंडपीठ में मतभेद सामने आए तो इसे पाँच जजों की खंडपीठ को सौंपा गया.
सरकार के लिए धक्का
इससे पहले सरकार ने मुठभेड़ों से संबंधित पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के नाम सुरक्षा के सवाल पर सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया था.
अदालत के इस आदेश को सरकार के लिए भारी धक्का माना जा रहा है क्योंकि कई पर्यवेक्षक मानते हैं कि इससे पुलिसकर्मी काफ़ी दबाव में आ जाएँगे. लेकिन नागरिक आधिकारों की संस्थाएँ ख़ुश हैं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता बुज्जा तराका का कहना था, "अब ये अदालत के हाथ में होगा कि वह तय करे कि मुठभेड़ फ़र्ज़ी है या फिर असल में हुई थी. जब एफ़आईआर दर्ज होगी तो मामला अदालत में तो जाएगा ही."
उनका कहना था कि क़ानून पुलिस को ये हक़ नहीं देता कि वह किसी पर गोली चलाए या फिर उसे मार दे.
नक्सल प्रभावित इलाक़ों में क्रांतिकारी कवि के रूप में चर्चित गदर का मानना था कि इससे 'शायद पुलिसवालों को कुछ समझ में आए क्योंकि यदि एफ़आईआर दर्ज नहीं होती तो पुलिस और सरकार को अदालत का सामना करना होगा.'