मंगलवार, 13 जनवरी, 2009 को 17:21 GMT तक के समाचार
भारत के प्रमुख टीवी न्यूज़ चैनलों के संपादकों की एक अहम बैठक में केबल टेलीविज़न नेटवर्क रेग्युलेशन एक्ट में प्रस्तावित संशोधनों पर गहरी चिंता प्रकट की है और कहा है कि यह मीडिया की 'स्वतंत्रता पर बहुत गंभीर हमला' है.
संपादकों की ओर से जारी साझा बयान में कहा गया है कि इस मुद्दे पर वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात करके उनसे हस्तक्षेप की अपील करेंगे, उनका कहना है कि ये 'संशोधन मीडिया को सरकार का गुलाम बना देंगे'.
सरकार प्रस्तावित संशोधनों के ज़रिए आतंकवाद, सेक्स, अपराध आदि के कवरेज को नियंत्रित करना चाहती है.
मुंबई में हुए हमलों के सीधे प्रसारण के बाद कुछ लोगों की ओर से यह माँग ज़ोर पकड़ने लगी थी न्यूज़ चैनलों पर किसी तरह का अंकुश ज़रूरी है.
संपादकों का कहना है कि उन्होंने अपने कामकाज पर नियंत्रण के लिए कई क़दम उठाए हैं लेकिन उन क़दमों को सरकार ने पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया है.
संशोधन हो जाने के बाद ज़िला मैजिस्ट्रेट, सब डिवीजनल मैजिस्ट्रेट और पुलिस कमिश्नरों के पास इस बात के अधिकार होंगे कि वे किसी चैनल के सीधे प्रसारण को रोक दें और प्रसारण में प्रयुक्त उपकरण ज़ब्त कर लें.
संपादकों का कहना है कि सरकार चाहती है कि जिन मुद्दों को 'राष्ट्रीय महत्व' का माना जाएगा उनसे संबंधित सभी वीडियो फुटेज को एक निगरानी एजेंसी के पास भेजना होगा, उनके मुताबिक़ इसका मतलब है कि सांप्रदायिक दंगों की हालत में दर्शकों को सही रिपोर्ट नहीं मिल सकेगी.
प्रस्तावित संशोधनों के तहत अफ़सरों के पास यह तय करने का अधिकार होगा कि कोई सामग्री क़ानून-व्यवस्था के लिए ख़तरा पैदा कर सकती है या राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल है, वे ऐसे प्रसारणों को रोक सकते हैं.
टीवी समाचार चैनलों के संपादकों का कहना है कि सरकार के पास पहले ही ढेर सारे का़नूनी अख़्तियार हैं जिनका इस्तेमाल करके वह ग़लत तरीक़े से काम करने वाले चैनलों पर अंकुश लगा सकती है, और सरकार ने ऐसा किया भी है.
साझा बयान में संपादकों का कहना है कि "इस संशोधन का उद्देश्य नियम तोड़ने वालों पर लगाम लगाना नहीं बल्कि मीडिया की आवाज़ को दबाना है जो पूरे देश को इमरजेंसी के दौर में ले जाएगा".
संपादकों का कहना है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की कार्यपालिका को चौथे स्तंभ की आज़ादी का ख़याल रखते हुए "परिपक्व और संविधाने के अनुरूप" क़दम उठाने चाहिए.