बुधवार, 24 दिसंबर, 2008 को 06:45 GMT तक के समाचार
मुंबई पर हमला करने वाले दस चरमपंथियों में से ज़िंदा पकड़े गए मोहम्मद अजमल आमिर कसाब को अदालत ने छह जनवरी तक पुलिस हिरासत में रखने का आदेश दिया है.
ख़बर है कि सुरक्षा कारणों से इस बार भी क़साब के मामले की सुनवाई अदालत परिसर में नहीं हुई.
मुंबई पुलिस ने 12 मामले दर्ज किए हैं और पुलिस ने इनमें से एक मामले में उसे रिमांड पर लेने की अपील की थी.
पुलिस का कहना है कि कसाब को 26 नवंबर की रात गिरफ़्तार किया गया था.
कसाब के साथी गिरगांव चौपाटी के पास पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे और कसाब को पकड़ लिया गया था.
पुलिस का कहना है, ''हमने कसाब पर हत्या, हत्या का प्रयास, देश के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने, षड्यंत्र करने और विस्फोटक और हथियार अधिनियम कि विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज किए हैं. ''
पाकिस्तान का इनकार
इधर, भारत सरकार ने कसाब का लिखा हुआ एक पत्र दिल्ली में पाकिस्तानी दूतावास को हाल में सौंपा था जिसमें कसाब ने अपने और बाकी हमलावरों के पाकिस्तानी होने की बात स्वीकार की थी.
लेकिन पाकिस्तान सरकार ने एक बार फिर कहा है कि इन हमलों के दौरान ज़िंदा पकड़ा गया चरमपंथी कसाब पाकिस्तानी नागरिक नहीं है.
इस पत्र के मिलने के बाद पाकिस्तान गृह मंत्रालय के प्रमुख रहमान मलिक ने इस्लामाबाद में पत्रकारों से साफ़ कहा कि पाकिस्तान के राष्ट्रीय डाटाबेस और पंजीकरण प्राधिकरण में अजमल आमिर इमाम उर्फ़ अजमल कसाब नाम का कोई व्यक्ति नहीं है.
रहमान मलिक ने कहा, ''जहाँ तक अजमल कसाब की बात है हमारे रिकार्ड्स में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है. ''
बचाव पर बवाल
दूसरी ओर मुंबई के संदिग्ध हमलावर मोहम्मद अजमल आमिर कसाब का अदालत में बचाव का मुद्दा जटिल होता जा रहा है.
इसके पहले मुंबई की लगभग एक हज़ार सदस्यों वाली बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित कर कसाब का बचाव न करने का निर्णय लिया था.
इसकी वजह से मुंबई का कोई भी वकील कसाब की तरफ से कोर्ट में केस लड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहा है.
जब 11 दिसंबर को कसाब को दो सप्ताह की पुलिस रिमांड पर लेना था, तो क़ानूनी सहायता पैनल ने एक वकील से उनके बचाव में उपस्थित रहने को कहा था लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया था.
कुछ वकीलों ने उनके बचाव की पेशकश की थी लेकिन उनके घरों पर शिव सेना के उग्र प्रदर्शन और तोड़फोड़ के बाद वो भी पीछे हट गए.
उल्लेखनीय है कि कोई भी भारतीय या विदेशी यदि निजी वकील नहीं रख पाता है तो उसे मुफ़्त क़ानूनी सहायता उपलब्ध कराने का प्रावधान है.
भारतीय संविधान ने ये अधिकार हर शख्स ने दे रखा है.