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मंगलवार, 23 दिसंबर, 2008 को 20:00 GMT तक के समाचार

विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर

एक परिवार के बहाने कश्मीर का दर्द

अगस्त, 2008 में जब श्रीनगर की सड़कों पर आज़ादी का संघर्ष एक बार फिर ऊफान पर था, आंसू गैस का एक गोला फ़िरोज़ अहमद ख़ान के सिर पर लगा.

तेरह दिन और पाँच ऑपरेशन बाद आख़िर वह ज़िंदगी की लड़ाई हार गया.

बाईस साल का फ़िरोज़ आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ रहा था. वो रोज़ी रोटी कमाने अपनी दुकान पर गया था.

लेकिन मौत के बाद उसका नाम भी उन 70 हज़ार लोगों में शामिल हो गया जिन्होंने पिछले 20 सालों में आज़ादी के संघर्ष को लेकर अपनी जानें गँवाई हैं. कश्मीर के लोग उन्हें शहीद कहते हैं.

अब फ़िरोज़ के परिवार वालों के पास सिर्फ़ तस्वीर है और उसकी ढेर सारी यादें.

फ़िरोज़ की छोटी बहन कौसर कहती है, “हम हर वक़्त उसे याद करते हैं. मेरी माँ भी नमाज़ पढ़ते वक़्त रोती रहती है. हमें महसूस होता रहता है कि हमारा भाई शहीद हो गया.”

जब यह हादसा हुआ तो फ़िरोज़ के परिवार वाले उसकी शादी की तैयारी कर रहे थे. महीने भर बाद उसकी शादी थी.

परिवारवाले बताते हैं कि वह बहुत ख़ुश था. उसने कपड़े सिलवाए थे. अब वो कपड़े संदूक में रखे हुए हैं.

फ़िरोज़ की मौसी कहती हैं कि उसे देखना अब बर्दाश्त नहीं होता.

लेकिन इस परिवार के लिए फ़िरोज़ की मौत अकेली चीज़ नहीं है जो उन्हें बर्दाश्त नहीं हो रही हो.

आज़ादी की लड़ाई के तुरंत बाद जो चुनाव हो रहे हैं और उसमें लोग जिस तरह भाग ले रहे हैं वो भी फ़िरोज़ के परिवारवालों को नागवार गुज़र रही है.

फ़िरोज़ की भाभी नुसरत की बातों में नाराज़गी साफ़ है, “आज़ादी के लिए लड़ रहे थे तो ठीक था लेकिन जो वोट डालने निकले वो गद्दार निकले.”

यह नाराज़गी सिर्फ़ वोट डालने वालों से नहीं है, राजनीतिज्ञों के प्रति भी है. कौसर की बातों से जो नाराज़गी झलकती है वह नाराज़गी घाटी के बहुत बड़ी आबादी के मन में महसूस की जा सकती है.

वो कहती है, “जब मेरा बेटा शहीद हुआ तो सब नेता हमारे घर आए लेकिन उसके बाद से कोई कुछ पूछने नहीं आया. किसी को हमारी फ़िक्र ही नहीं है.”

राजनीति के प्रति जो निराशा इस परिवार में है उसे पिछले चार दिनों में श्रीनगर की आठों विधानसभा सीटों में घूमते हुए मैंने बार-बार लोगों के मन में उमड़ते देखा.

फ़िरोज़ की मौसी कहती हैं, “ये लोग बहुत कहते रहते हैं कि ये करेंगे, वो करेंगे लेकिन जब अपना मक़सद निकल जाता है तो फिर लोगों को छोड़ देते हैं.”

फ़िरोज़ के चचेरे भाई आमिर की उम्र अभी वोट डालने की नहीं हुई लेकिन राजनीतिज्ञों के चेहरे वो पहचानने लगा है.

शायद अपने समाज और परिवेश से यह समझ उसे विरासत में मिल रही है.

वो कहता है, “ये लोग कहते हैं कि वोट डालो फिर बिजली-पानी वगैरह सब मिलेगा लेकिन वोट डालने के बाद ये सब भूल जाते हैं, सिर्फ़ अपना घर भरते हैं. ये सब झूठे हैं.”

कौसर, नुसरत, आमिर और उसकी मौसी मुखर हैं और अपनी बात कह लेते हैं अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर कर लेते हैं.

फ़िरोज़ की मौसी कहती हैं, “हमें आज़ादी चाहिए और कुछ नहीं चाहिए.”

तो नुसरत कहती है, “आज़ादी के लिए हम बंदूक उठा लेंगे. हज़ारों लोगों की जान गई तो अपनी आज़ादी के लिए हम भी अपनी जान दे देंगे.”

लेकिन फ़िरोज़ की माँ कोने में बैठी अपने आँसू पोंछती रहती है. और फ़िरोज़ का बड़ा भाई ख़ामोश बैठा सहमति में सिर हिलाता रहता है.

एकबारगी लगता है कि यह परिवार उस दर्द और नाराज़गी को बयान करता है जो कश्मीर के बड़े हिस्से में बसा है.

यह परिवार और बहुत से परिवार चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं वो इसलिए कि उनको आज़ादी से कम कुछ नहीं चाहिए.

लेकिन जो लोग वोट डाल रहे हैं वो भी तो आज़ादी को अपना अंतिम हक़ मानते हैं.