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आतंकवाद पर नए क़ानून की आलोचना

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत में प्रस्तावित नए आतंकवाद निरोधक क़ानून की आलोचना की है.

संसद के दोनों सदनों ने इस विधेयक को पास कर दिया है. लेकिन क़ानून बनने से पहले इसे राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलनी बाक़ी है, जिसे तय माना जा रहा है.

लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से अपील की है कि वे इस विधेयक पर हस्ताक्षर न करें.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की मधु मल्होत्रा के साथ बीबीसी हिंदी की बातचीत

एमनेस्टी इंटरनेशनल संगठन की एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए कार्यक्रम उपनेदेशक मधु मल्होत्रा ने बीबीसी हिंदी सेवा के साथ बातचीत में कहा है, "हम मुंबई हमलों की कड़ी निंदा करते हैं और ये भी मानते हैं कि भारत सरकार को अपनी जनता की सुरक्षा और अन्य चिंताओं को हल करने के लिए प्रभावी क़दम उठाने का पूरा अधिकार है. ये उनका कर्तव्य भी है. लेकिन इनके कारण लोगों के मानवाधिकार को जोखिम में नहीं डाला जा सकता है."

मधु मल्होत्रा का कहना था, "एमनेस्टी इंटरनेशनल मानता है कि किसी भी देश को आतंकवाद जैसी चुनौती का सामना करने के लिए नीति-नियम और क़ानून बनाने का पूरा अधिकार है मगर वो सभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौजूद क़ानूनी मानकों का ध्यान रखते हुए बनाए जाने चाहिए."

मधु मल्होत्रा का कहना था कि जिस भी देश में आतंकवादी हमले हुए हैं वहाँ आनन-फानन में तुरंत प्रतिक्रिया के प्रभाव के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अनेक क़ानून भी बना दिए जाते हैं जो अक्सर अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं.

प्रावधान

इस क़ानून में जज के आदेश पर संदिग्ध व्यक्ति को बिना ज़मानत छह महीने तक जेल में रखने का प्रावधान है. इस क़ानून में अन्य कई कड़े प्रावधान भी हैं.

मधु मल्होत्रा का कहना था, "सबसे आपत्तिजनक प्रावधान ये है कि बिना मुक़दमा चलाए ही किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को छह महीने तक जेल में बंद रखा जा सकता है. यह प्रावधान अंतरराष्ट्रीय मानकों से बहुत-बहुत दूर है क्योंकि किसी भी देश में किसी व्यक्ति को बिना मुक़दमा चलाए हुए इतनी लंबी अवधि तक बंदी बनाकर नहीं रखा जा सकता है."

मधु मल्होत्रा के अनुसार इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग होने की बड़ी संभावना है और जो भी अधिकारी चाहे, इसका दुरुपयोग अपने अनुसार कर सकता है.

"भारत एक प्रगतिशील देश है और इस तरह के क़ानूनी प्रावधान करने से वह कई क़दम पीछे चला जाता है. "

भारत में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार ने पिछले महीने मुंबई में हुए हमलों के बाद इस क़ानून की पहल की थी. इन हमलों में 170 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

मुंबई हमलों के बाद देश की ख़ुफ़िया और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर काफ़ी दबाव है.

माना जा रहा है कि नया क़ानून इसी के बाद की गई पहल है. इस क़ानून के तहत राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) बनाने का भी प्रावधान है.

ग़लत इस्तेमाल

एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि पहले भी भारत में आतंकवाद निरोधक क़ानून थे और ये बात सामने आई थी कि इन क़ानूनों का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है.

अभी तक भारत सरकार की ओर से इस पर कोई बयान नहीं आया है. हालाँकि भारत में कम्युनिस्ट पार्टियाँ और कुछ मुस्लिम संगठनों ने नए क़ानून को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के बुद्धदेब आचार्य ने समाचार एजेंसी एपी को बताया, "एक व्यक्ति को 180 दिनों तक हिरासत में रखना उसके मानवाधिकार का उल्लंघन होगा. हम इसके ख़िलाफ़ हैं."

हालाँकि गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि नया क़ानून मुक़दमा चलाने के सुरक्षा एजेंसियों के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवाधिकार में संतुलन स्थापित करता है.

कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के शासनकाल में बने आतंकवाद निरोधक क़ानून (पोटा) को यह कहते हुए ख़त्म कर दिया था कि इसका ग़लत इस्तेमाल हुआ है और मुसलमानों को निशाना बनाया गया.