मंगलवार, 16 दिसंबर, 2008 को 07:22 GMT तक के समाचार
बीनू जोशी
बीबीसी संवाददाता, डोडा से
पिछले 30 साल में भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के डोडा निवासी अख़्तर हुसैन की ज़िंदगी में बहुत बड़ा बदलाव आया है. उनकी ज़िंदगी ने क़ानून तोड़ने वाले एक चरमपंथी से शेक्षक और फिर क़ानून को लागू कराने वाले ड्यूटी मजिस्ट्रेट तक का सफ़र तय किया है.
वर्ष 2008 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के छठे चरण के दौरान 17 दिसंबर को डोडा के बीरशाला इलाक़े के सारे मतदान स्थलों पर क़ानून और व्यवस्था लागू कराने के लिए ड्यूटी मजिस्ट्रेट बनाया गया है. राज्य प्रशासन ने डोडा के सरकारी डिग्री कॉलेज में उर्दू के इस लेक्चरार को एक 'कर्मठ कार्यकर्ता' के रूप में चुना है.
पुराने दिनों की याद करके अख़्तर मानते हैं, "मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मैं यहाँ तक पहुँचूँगा...मैं ज़ाहिर नहीं कर सकता कि मुझे कितना अच्छा लग रहा है कि मुझे सरकार की ओर से यह काम मिला.. चुनाव संपन्न कराने के लिए मजिस्ट्रेट बनाया जाना...."
चरमपंथ की लहर
अख़्तर ने बीबीसी को बताया कि जब वे 1993 में नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे तो उन्होंने चरमपंथ में पाँव रखा था. उन्होंने कहा, "तब चरमपंथ शिखर पर था. यह एक लहर की तरह था जिसने हममें से ज़्यादातर लड़कों को अपनी लपेट में ले लिया था."
उन्होंने कहा कि लड़कों को हथियारों की ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर ले जाया जाता था, "हमारा गुट 'अल-जेहाद ग्रुप' था."
ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान इस बात का खंडन करता है कि उसकी भूमि पर कश्मीरी चरमपंथियों को प्रशिक्षण दिया जाता है. पाकिस्तान का कहना है कि वह कश्मीरियों को केवल कूटनीतिक समर्थन देता है.
किसी ख़ुफ़िया एजेंसी का नाम लिए बिना उन्होंने कहा, "हमें (चरमपंथी) 1996 के चुनावों में बाधा डालने के लिए कहा गया लेकिन निजी रूप से मैं इसके पक्ष में नहीं था और मैंने इस पर अमल नहीं किया था."
चार साल तक चरमपंथियों का साथ देने के बाद अपने नेता सैयद फ़िरदौस के साथ 1997 में उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया.
उन्होंने कहा, "मैं जब चरमपंथ में आया और जब मैंने आत्मसमर्पण किया, तब मैं समुचित रूप से परिपक्व नहीं था."
गोल्ड मेडल
अख़्तर ने चरमपंथ छोड़ने के बाद अपनी पढ़ाई पूरी की. वे गर्व से बताते हैं, "मैं कॉलेज के दिनों में भी छात्र नेता था और मैंने पोस्ट ग्रेजुएट में गोल्ड मेडल हासिल किया."
इसके बाद तीन महीने पहले राज्य जन सेवा आयोग की परीक्षा में सफल होने पर उनकी नियुक्ति उर्दू के लेक्चरर के रूप में हुई. उन्होंने कहा, "मुझे शिक्षा और सीखने की शक्ति में हमेशा विश्वास रहा है जिसने मुझे अब इस पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया है."
अब अख़्तर इस नौकरी के साथ-साथ उर्दू में डॉक्टरेट भी कर रहे हैं.
वे कहते हैं कि उन्हें अफ़सोस करने से नफ़रत है, इसलिए, "उस वक्त चरमपंथ में जाना भी ठीक था और उसे छोड़ देना भी सही निर्णय था."
क़ानून की शक्ति
उन्होंने चरमपंथ के उन दिनों में बंदूक की शक्ति भी देखी लेकिन वे कहते हैं, "क़ानून को लागू कराने की शक्ति का मज़ा निश्चित रूप से उससे कहीं ज़्यादा है क्योंकि इससे मुझे ख़ुद पर गर्व की अनुभूति होती है."
उनके पाँच भाई हैं जो व्यापार में लगे हुए हैं और चार बहनें हैं. अभी कुछ ही महीनों पहले अख्तर की शादी हुई है.
उनकी पत्नी को भी पढ़ाई से बहुत लगाव है और इसीलिए वह भी इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की दूरस्थ शिक्षा से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कर रही हैं.
उनके पिता एक मस्जिद में इमाम हैं. उनकी माँ उस वक्त सिधार गई थीं जब वे चरमपंथ की ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान में थे. इस बारे में जानने के बाद जब वे डोडा वापस आए. उन्होंने कहा, "उस दिन मैं बहुत परेशान था. मुझे लगा था कि जैसे घर पर कुछ बहुत बुरा हो गया है."
अख़्तर को लगता है कि चरमपंथ ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है और मानसिक तौर पर परिपक्व बनाया है.
वे कहते हैं, "प्रजातंत्र ही शासन का सबसे बेहतरीन तरीका है लेकिन इन चुनावों का कश्मीर की समस्या के हल से कोई लेना-देना नहीं है. हालाँकि चुनाव में कश्मीरी लोगों का बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना बहुत अच्छा संकेत है."