बुधवार, 03 दिसंबर, 2008 को 22:53 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, मुंबई से
लीना अपने पुरुष मित्र अर्ना स्ट्रॉम और एक भारतीय मूल की महिला के साथ कैफ़े लियोपॉल में बीते बुधवार की रात बैठकर कुछ खा-पी रहे थे.
मुंबई रात को कैफ़े और पबों की चमक दमक, उनमें होने वाली चहल पहल, चुहलबाज़ियों और विदेशी नागरिकों के जमावड़े के लिए जाना जाता है.
यह हर शाम की तरह ही एक शाम थी. पर साढ़े नौ बजे के बाद यह शाम इस शहर की अबतक की शायद सबसे मनहूस शाम में बदल गई.
ताज होटल के पीछे कोलाबा के इलाक़े में ऐतिहासिक महत्व के हो चले कैफ़े लियोपॉल को भी चरमपंथी हमलावरों ने अपना निशाना बनाया.
नॉर्वे से आई लीना इस हादसे में बच गई हैं. उनके पुरुष मित्र की हालत अभी भी गंभीर है. वो बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती हैं.
साथ बैठी भारतीय मित्र के बारे में पूछने पर लीना की आवाज़ बंध जाती है. उनकी मित्र हमले में मारी गईं.
ख़ुशी ग़म में तब्दील
तो क्या हुआ था उस रात, कैफ़े लियोपॉल में, लीना इस तरह बताती हैं- हम उस शाम बहुत खुश थे. आठ बजे के आसपास हम इस कैफ़े में आए. हमने कॉफी मंगाई, गपशप की. सुबह हमें मुंबई से दिल्ली के लिए निकलना था और फिर वहाँ से वापस नॉर्वे जाना था.
अभी साढ़े नौ बजे थे कि एकदम से गोलियों के चलने की आवाज़ आई. हम लोग कुछ समझ पाते तबतक बहुत से लोग शिकार बन चुके थे. हमलावर मशीनगन से गोलियाँ चला रहे थे.
मैंने अपने मित्रों से कहा कि तुरंत नीचे बैठ जाओ. गोलीबारी हुई और फिर रुक गई. सन्नाटा पसर गया कुछ सेकेंडों के लिए. फिर अचानक ही दोबारा गोलीबारी शुरू हो गई.
रोने चीखने की आवाज़ें
हर तरफ़ रोने चीखने की आवाज़ें आ रही थीं. लोग मर रहे थे या घायल थे. कांच के टूटने की आवाजें आ रही थीं. लोगों के सामान चिथड़ों की तरह हवा में उड़ रहे थे. हम किसी तरह सांस लेने की कोशिश कर रहे थे.
कुछ क्षणों के लिए फिर सन्नाटा... और फिर गोली चलने लगीं. मैंने अपने दोस्तों को दोनों हाथों से पकड़ लिया. हम नीचे पड़े हुए थे. तभी मुझे लगा कि मेरी भारतीय मित्र को गोली लगी है.
वो मेरे हाथों में ही ढह गई. वो मर चुकी थी शायद...तभी एक गोली मेरे पुरुष मित्र को भी लगी. गोली उसके चेहरे पर लगी. वो ख़ून में नहा उठा और साथ में मैं भी. उसने कहा, मेरा चेहरा नष्ट हो चुका है...मैंने उसे तुरंत हल्के शब्दों में कहा कि चुप रहो और छिपे रहो क्योंकि वो लोग अभी भी आसपास ही हैं.
इसके बाद सबकुछ शांत हो गया. मैंने देखा कि मेरा दोस्त मृतप्राय था. कई लोग घायल या मरे पड़े थे. कुर्सियां टेबल गिरे हुए थे. एक वेटर चीज़ों को संभालने की कोशिश कर रहा था और दूसरा फ़ोन करके एंबुलेंस की मदद माँग रहा था.
मैं ही जीवित थी
मुझे लगा कि वहां बैठे लोगों में एक मैं ही थी जो जीवित थी. मुझे लगा कि मैं ही ज़िंदा बची हूं तो लोगों की मदद अब मेरी पहली ज़िम्मेदारी है. मैं फर्श पर घिसटते हुए कुछ आगे बढ़ी और उठने के लिए पलटी ही थी कि...
मैंने देखा कि कैफ़े के पिछले रास्ते से एक हमलावर दाखिल हो रहा है. वो हमारी ही ओर देख रहा था. हम नीचे पड़े थे सांसे रोके. उसने मुझे भी देखा.
पर हमले के बाद मेरी पहचान एक विदेशी के तौर पर संभव नहीं थी. मैं पंजाबी कपड़े पहनकर आई थी. एक दुपट्टा भी था जो हमलों से बचने के दौरान मेरे सिर पर आ गिरा था.
मेरा चेहरा और सिर ख़ून में लिपटे हुए थे इसलिए चेहरे और बालों का रंग भी समझ पाना मुश्किल ही था.
उसकी बंदूक़ मेरी पीठ के पास थी. मैं उस बंदूक की एक गोली अपनी पीठ के भीतर महसूस करने लगी थी पर ऐसा नहीं हुआ.
सबकुछ थम गया
15 मिनट तक सबकुछ थमा रहा. फिर लोगों के चीख़ने चिल्लाने की आवाज़ें आने लगीं. हम अभी भी मानने को तैयार नहीं थे कि हमलावर चले
गए हैं पर कुछ देर में सुरक्षाबल आ गए और हमें निकाला जाने लगा.
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कैफ़े लियोपॉड के भीतर फंसे लोगों में शायद मैं ही अकेली इंसान थी जिसे कोई चोट नहीं आई थी और जो शुरू से आखिर तक पूरे हमले की गवाह थी.
पुलिसवाले और राहतकर्मी हम सभी लोगों को वहाँ से जीटी अस्पताल ले गए. इस अस्पताल में और जगहों से भी लोग लाए जा रहे थे. ख़ासी भीड़भाड़ थी.
हमें मालूम था कि और लोगों के लिए भले ही मुश्किल हो पर हमारे लिए इलाज का खर्च उठाना मुश्किल नहीं था. बेहतर था कि सरकारी व्यवस्था को आम लोगों के लिए ख़ाली किया जाता. फिर मेरे दोस्त की हालत बहुत नाज़ुक थी.
यही सोचकर हमने लोगों से पूछा कि मुंबई का सबसे अच्छा निजी अस्पताल कौन सा है. किसी ने बॉम्बे हास्पिटल का नाम लिया. मैंने एक टैक्सी को ज़बरदस्ती रोका, उसमें बैठे लोगों को नीचे उतारा, उन्होंने हालात देखकर विरोध भी नहीं किया और हम यहाँ आ गए.
यह सबकुछ बहुत ही ख़तरनाक और दहला देनेवाला था. 29 तारीख को मुझे एक अख़बार के ज़रिए इस बात की पुष्टि हुई कि मेरी भारतीय मित्र की मौत हो गई है.
बेहतरी का इंतज़ार
हम लोगों को 30 नवंबर को एक यूरोपीय विमान से नॉर्वे जाने का प्रस्ताव मिला था.
हम जा सकते थे पर नहीं गए. हम यहीं रुककर और अपने मित्र की हालत बेहतर होने तक इंतज़ार करेंगे.
ऐसा इसलिए क्योंकि अब हमें इस शहर में रुकना होगा. हम इस शहर के और भारतीय नागरिकों के घावों के भरने और दर्द से में उनके साथ रहना चाहते हैं.
हमारे लिए अब यह बात बहुत अहम है. यह संदेश देना है कि उन बुरे लोगों के ख़िलाफ़ हम एक साथ खड़े हैं.
मुंबई छोड़ने से पहले हम एक बार उसी कैफ़े लियोपॉल में दोबारा जाना चाहेंगे. हम अब भारत से, इस शहर से इस घटना के बाद एक गहरा रिश्ता महसूस कर रहे हैं.
यह रिश्ता प्यार का है और घृणा का भी. ये प्यार करनेवालों का शहर है. हम यहाँ फिर आएंगे.