बुधवार, 03 दिसंबर, 2008 को 09:34 GMT तक के समाचार
सर मार्क टली
बीबीसी के पूर्व संवाददाता
मुंबई में हुए हमलों के दूसरे दिन भारत के एक प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' की सुर्खी थी 'ऑवर नाइटमेयर, ऑवर वेक अप काल' यानी कि 'हमारा दुखद सपना, हमे जगाने वाली घंटी.'
लेकिन क्या इससे भारत जागेगा? अगर हम पिछले दिनों हुई घटनाओं को देखें तो उत्तर होगा नहीं.
भारत एक विशालकाय समुद्री जहाज जैसा है जो हिलता डुलता हुआ पानी को चीरता चलता है और ऐसे आंधी तूफ़ान में भी डूबता नहीं जिसमें छोटी नौकाएं या अस्थायी जहाज़ डूब जाते हैं.
क्या है भारत
भारत ने कई युद्ध, दंगे, क़त्ल और आतंकवादी घटनाएं देखी हैं लेकिन ये जहाज़ ये इन सभी मुसीबतों को आराम से झेलता हुआ निकल जाता है.
मुझे याद है कि अयोध्या में उग्र हिंदुओं ने जब एक ऐतिहासिक मस्जिद को तोड़ दिया था तो पूछा गया था कि क्या यहाँ दो मुख्य धार्मिक समुदायों के बीच जो भाईचारा हैं वह ख़त्म हो जाएगा और भारत लेबनान व उत्तरी आयरलैंड बन जाएगा.
मैं नहीं सोचता कि ऐसा होगा क्योंकि भारत में तनाव तेज़ी से बढ़ता है और उसी तेज़ी से ख़त्म भी हो जाता है.
लेकिन इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि भारतीय अगर एक बार शांत हो जाते हैं तो उनमें समस्या को नज़रअंदाज करने की प्रवृत्ति होती है और समस्या के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाते हैं.
मुंबई पर हुए चरमपंथी हमले से पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों की ख़ामियाँ एक बार फिर उभर कर सामने आई हैं.
हमले की पहली शाम वहाँ केवल छह या सात पुलिसवाले थे. उनमें भी कोई तालमेल या अनुशासन नज़र नहीं आ रहा था.
वहीं महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के प्रमुख जिन्हें उस समय कंट्रोल रूम में होना चाहिए था, वो मोर्चा संभालने पहुँच गए और मारे गए.
टीवी समाचार चैनलों को पुलिस की कार्रवाई का प्रसारण करने की छूट दी गई जिसने चरमपंथियों को महत्वपूर्ण सूचनाएँ मुहैया कराईं.
कमियाँ और राजनीतिक हस्तक्षेप
अब यह साफ़ हो चुका है कि वहाँ ख़ुफ़िया एजेंसियों और सुरक्षा बलों के बीच तालमेल का अभाव था. इसमें पुलिस और नौसेना भी शामिल है.
प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि चरमपंथ से लड़ने के लिए एक संघीय जाँच एजेंसी का गठन किया जाएगा.
इस बीच दिमाग में एक एक बात जो उभर कर सामने आ रही है वह यह कि मौज़ूदा जाँच एजेंसियों के काम में राजनीतिक दख़लंदाज़ी होती है.
मुझे केंद्रीय जाँच आयोग (सीबीआई) के एक पूर्व निदेशक ने बताया था कि राजनीतिक हस्तक्षेप ने इस एजेंसी को दबाव बनाने वाला एक सरकारी हथियार बनाकर रख दिया है.
क्या नई बनने वाली संघीय जाँच एजेंसी राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होगी? इस पर मुझे संदेह है. अगर मैं ग़लत साबित होता हूँ तो
राजनीतिज्ञों की डुबो देने वाली अपनी नीतियाँ बदलनी होंगी.