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मंगलवार, 02 दिसंबर, 2008 को 17:15 GMT तक के समाचार

पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, मुंबई से

'डर के आगे जीत है...'

एक चरमपंथी हमला कुछ लोगों को मारता है, कुछ घायल होते हैं पर इनसे कहीं ज़्यादा लोग आतंकित होते हैं.

समाज में जिस एक हिस्से के दिमाग़ पर इन हमलों का सबसे बुरा असर पड़ता है वे हैं बच्चे. मुंबई के कुछ स्कूलों में बच्चे ऐसी ही बातें करते नज़र आए.

दिनभर की पढ़ाई के बाद घर लौटते बच्चों से और उनके अभिभावकों से बात करने का मुझे मौका मिला.

मैंने इन बच्चों में से एक, संदीप पवार को लेने आए उसके दादा से पूछा कि धमाकों और हमलों के बाद बच्चे क्या पूछ रहे थे तो जवाब मिला,"बच्चे इन धमाकों से डरे हुए हैं. हम लोगों के मन में भी डर समाया रहता है. बच्चे स्कूल आते हैं तो इनकी चिंता लगी रहती है."

उन्होंने कहा, "ये लोग पूछते हैं कि कहाँ धमाका हुआ है. किसने किया है, क्यों किया है. टीवी पर हमले की कार्रवाई को देखते हैं तो इनके दिमाग़ों पर असर पड़ता है."

इससे पहले भी मुंबई चरमपंथी हमलों का शिकार होती रही है. वर्ष 2006 में यहां लोकल ट्रेनों में धमाके हुए थे. धमाकों के बाद से इस बात को लेकर चिंता बढ़ी है कि दहशत पैदा करने वाले इन हाल के बरसों में बच्चों के लिए ख़ासतौर पर बुरा समय रहा है.

घटनाओं के संदर्भ में बच्चे ऐसी कितनी ही बातें सोचते हैं जिनका उनके दिमाग़ पर व्यापक असर पड़ता है.

बालसुलभ मन

हिंसा के विषय बालसुलभ मन के लिए रोचक होते हैं, जिज्ञासा पैदा करते हैं. हिंसक हमलों की कहानी फ़िल्मों के दृश्यों की तरह उनके दिमाग़ में बसती जाती हैं. पर ख़तरा यह है कि उनके स्वभाव, व्यवहार और विचारों पर भी इसका असर दिखता है.

इस बार मीडिया में जिस व्यापक स्तर पर हमलों की कवरेज हुई, उसे बच्चों ने भी देखा, समझा और फिर इनके मायने, नतीजे निकाले.

बच्चे उत्सुकता से बताते हैं कि उनके पास एके-47 और एके-56 बंदूक थी, ग्रेनेड थे, टाइम बम थे. पुलिस के पास तो जो बुलेटप्रूफ़ जैकेट थीं वो बेकार थीं. वो आतंकवादियों की गोलियों से नहीं बचा सकती थीं.

साफ़ है, जिस तेज़ी से पत्रकार बातों को जोड़कर कहानी बनाते चलते हैं, बच्चे कल्पना के संसार में उन नतीजों की ख़तरनाक तस्वीर तेज़ी से गढ़ते जाते हैं.

बड़ों जैसी बातें

इस बातों के अलावा बच्चे वो सब भी सुनते सीखते हैं जो घरों और उनसे बड़ों के बीच ऐसे हमलों के बाद बहस और बातचीत का मुद्दा होता है.

आठवीं क्लास का शहवाज़ और उसके साथी कहते हैं, "नेता लोगों को तो अपने काम से काम है, ये भीख मांगने आते हैं वोटों की और उसके बाद लोगों को भूल जाते हैं. कोस्ट गार्ड ने भी लापरवाही की है. ये आंखें खोलकर रखते तो हमले क्यों होते."

ऐसी कई बातों में और भी बच्चे शहबाज़ के साथ सुर में सुर मिलाते हैं और फिर ठहाके लगाते हैं. मानो नेता अनुसरण के नहीं, उपहास के पात्र हों.

पर ऐसी हिंसक घटनाओं के बाद क्या स्कूल, खेल के मैदान, दोस्तों के घर, पाव भाजी, चॉकलेट, चिप्स की दुकानों की ओर जाते उन्हें डर नहीं लगता. सवाल सुनकर बच्चे एक क्षण रुकते हैं, सहमते हैं और फिर बड़ों जैसी बातें करके मुझे छोटा बना देते हैं.

बच्चे कहते हैं, "वो विज्ञापन नहीं देखा अंकल, वही...डर के आगे जीत है... डरकर क्या होगा, मरनेवाले को घर में भी मौत आ जाएगी. बचनेवाला कहीं भी बचेगा. माँ-पिता मना करते हैं. डर लगता भी है पर क्या करें. स्कूल जाना ही है, खेलने जाना ही है..."

मुझसे बातचीत कर रही बच्चों की टोली को हॉकी के मैच के लिए देर हो रही थी. आँखों में चमक और भय से इतनी जल्दी उबरने का साहस जो इन बच्चों में था, शहर के बड़ों में शायद नहीं.