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गुरुवार, 27 नवंबर, 2008 को 20:28 GMT तक के समाचार

सुशील कुमार झा
बीबीसी संवाददाता, मुंबई से

लोगों में ग़ुस्सा, हताशा और बेबसी

मुंबई में हुए हमलों के बाद लोगों में गुस्सा, दुख और हताशा दिखती है साथ ही झलकती है उनकी आंखों से बेबसी कि कब तक वो ऐसे हमलों का सामना करते रहेंगे.

जब वो 90 के दशक में हुए विस्फोटों को बुरी याद की तरह भुला चुके थे तो 2006 में रेल में हुए विस्फोटों ने मुंबई को एक बार फिर ज़ख़्मी कर दिया.

वो ज़ख्म अभी भरे नहीं थे कि वहाँ देश का सबसे बड़ा 'सुनियोजित आतंकी हमला' हो गया.

24 घंटों से अधिक समय से अधिक समय बीत जाने के बाद भी चरमपंथियों के साथ सुरक्षा बलों की मुठभेड़ चल रही है और लोगों को बचाने की कोशिशें जारी है.

असुरक्षा

ओबराय होटल के बाहर अपने 12 साल के बच्चे के साथ आए केतन वखारिया कहते हैं कि जो हो रहा है वो ठीक नहीं हो रहा है और मुंबई में अब असुरक्षा की भावना घर कर रही है.

वो कहते हैं, "मेरा आफिस बिल्कुल ओबराय के पास में है. अब मुझे डर लगने लगा है. कोई सुरक्षित नहीं है इस शहर में. कब किसके साथ क्या हो जाए किसी को पता नहीं. घर से निकलो तो पता नहीं घर पहुंचेंगे या नहीं."

केतन व्यावसायिक कंपनी में अच्छे पद पर काम करते हैं और उन्हें लगता है कि इस समस्या का कोई समाधान ही नहीं है.

वो कहते हैं, "ग़ुस्सा भी आता है दुख भी होता है लेकिन किसको बोलें क्या बोलें. कोई कुछ करता थोड़े है. कोई समाधान दिखाई नहीं देता है. पहले बंगलौर में हुआ, दिल्ली में हुआ. मुंबई में पहले हो चुका है. लेकिन कोई कुछ कर नहीं रहा है कि ये सब रुके. मुंबई सुरक्षित नहीं रह गई है."

केतन जहाँ हताश दिखते हैं वहीं ज़ुबैर बड़े नाराज़.

वो मुंबई पुलिस से भी ख़ासे नाराज़ दिखे.

उनका कहना था, "मुंबई पुलिस इतने बड़े बड़े दावे करती है लेकिन काम देख लो उनका आप. एटीएस का प्रमुख मारा जाता है. करकरे जैसा ईमानदार अधिकारी मारा जा रहा है. पुलिस को कुछ पता नहीं क्या हो रहा है. पूरे देश में पिछले छह महीने में धमाके हुए और मुंबई का नाम सबसे ऊपर था लेकिन फिर चूक हो गई."

ज़ुबैर जवान हैं शायद इसलिए नाराज़ भी लेकिन नरीमन प्वाइंट के पास ही रहने वाली कोठारी दंपत्ति अत्यंत संयत प्रतिक्रिया देते हैं और साथ ही सुझाव भी.

हताशा

योगेन कोठारी कहते हैं कि ये सब काम भटके हुए लोगों का है जिन्हें ग़लत पाठ पढ़ाया गया है.

योगेन सुझाव देते हुए कहते हैं, "हमें इसराइल और अमरीका से सीखना चाहिए कि आतंकवाद से कैसे निपटा जाता है. सीखने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि अगर ये नहीं रुकेगा तो सोचिए क्या होगा. हम तो कभी कभी बिल्कुल हताश हो जाते हैं."

योगेन की पत्नी वेणु कहती हैं कि उन्हें पहली बार लगा कि ऐसी कोई घटना उनके साथ भी हो सकती है.

वो कहती हैं, "हम पास में रहते हैं. जब पता चला तो पहली प्रतिक्रिया तो यही थी कि बिल्कुल झटका लगा और विश्वास नहीं हुआ. हम अख़बार में पढ़ते थे कि फलां जगह हमला हुआ. अब लगता है कि ये मेरे साथ भी हो सकता है. ये बहुत डरावनी फीलिंग है."

वेणु इस बात पर नाराज़ हो जाती हैं कि लोग बार बार ये क्यों कहते हैं कि मुंबई को टारगेट किया गया.

उनका अपना तर्क है. वो कहती हैं, "आतंकवाद नई बात नहीं है दुनिया के लिए या भारत के लिए. न्यूयार्क में पहले हुआ. ओलंपिक में ऐसी घटना हो चुकी है अब मुंबई में बंधक बनाया गया लोगों को तो इसके कारण मुंबई को बदनाम करना ठीक नहीं है."

मुंबई के लोग अपनी बात रखने से चूकते नहीं हैं.

अपनी प्रतिक्रिया देने से रुकते नहीं हैं और उनसे बात करने पर यही लगता है कि उनके लिए मुंबई की सरकार, पुलिस, प्रशासन, ट्रैफ़िक सबकुछ ख़राब हो सकता है लेकिन मुंबई से उनका प्यार कभी कम नहीं होगा.