बुधवार, 26 नवंबर, 2008 को 11:35 GMT तक के समाचार
आशुतोष चतुर्वेदी
बीबीसी संवाददाता
नारों का अपना महत्व है, इनके माध्यम से बात मतदाता तक पहुँचाई जा सकती है. साथ ही ये नारे कार्यकर्ताओं में जोश भर देते हैं, लेकिन नारे कभीकभार उल्टे भी पड़ जाते हैं.
भारतीय जनता पार्टी का ‘फ़ील गुड' और 'इंडिया शाइनिंग' यानि 'भारत-उदय' पार्टी पर इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है.
राजस्थान में भाजपा ने ‘जय-जय राजस्थान’ का नारा दिया है.
माना जा रहा है कि ये पिछले साल गुजरात में नरेंद्र मोदी के नारे ‘जीतेगा गुजरात’ से प्रभावित है.
इसके बाद दो और नारे आए हैं- 'अब नहीं रुकेगा राजस्थान' और 'कहो दिल से वसुंधरा फिर से'.
इसके जवाब में कांग्रेस की ओर से भी कई नारे सामने आए हैं.
लेकिन कांग्रेस के नारे 'भ्रष्टाचारियों का राज बदल दो' जैसे पुराने अंदाज़ वाले ही हैं या यों कहें कि ये जवाबी नारे हैं.
मिसाल के तौर पर कांग्रेस का नारे हैं- नहीं बिकेगा राजस्थान और बाय-बाय राजस्थान.
इसके अलावा कांग्रेस ने- राज बदल कर दम लेंगे और अब नहीं झुकेगा राजस्थान जैसे नारों को चलाया है.
नारों की परंपरा
इंदिरा गाँधी ने ग़रीबी हटाओं का नारा दिया था और ये नारा ऐसा चला कि वो उन्हें सत्ता की सीढ़ियों तक ले गया.
समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह ने नारा दिया- यूपी में दम है क्योंकि जुर्म यहाँ कम है.
अमिताभ बच्चन से इस नारे का प्रचार प्रसार करवाया गया. लेकिन लोगों ने इस पर भरोसा नहीं किया और सत्ता मायावती के हाथों सौंप दी.
दिल्ली में भाजपा ‘महंगी पड़ी कांग्रेस’ के नारे के साथ सत्ता पाने की कड़ी लड़ाई लड़ रही है.
उसने छत्तीसगढ़ में ‘तीन रुपए चावल, फोकट में नून, भाजपा सरकार को फिर से चुन’ नारा चलाया.
लेकिन प्रेक्षकों का मानना है कि अभी तक कोई बहुत लोकप्रिय नारे सामने नहीं आए हैं.