रविवार, 23 नवंबर, 2008 को 11:24 GMT तक के समाचार
तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा ने भारत में निर्वासन में रह रहे अपने अनुयाइयों को चीन की आम जनता के साथ संबंध बेहतर करने का सुझाव दिया है.
दलाई लामा का कहना है कि चीन की आम जानता पर उन्हें हमेशा विश्वास रहा है.
इसके विपरीत उनका ये भी कहना था कि चीन की सरकार तिब्बत में दमनकारी नीति अपनाए हुए है. उन्होंने निर्वासन में रह रहे तिब्ब्तियों को चेतावनी दी कि यदि वो सतर्क नहीं रहे तो बड़ा ख़तरा हो सकता है.
स्वायत्तता की माँग
दलाई लामा ने निर्वासन में रह रहे लोगों के उस फ़ैसले का स्वागत किया जिसमें तिब्बत की चीन से पूर्ण आज़ादी की जगह स्वायत्तता
की माँग को दोहराया गया है.
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ग़ौरतलब है कि दलाई लामा के इस नीति को मध्यमार्गी की नीति कहा जाता है.
धर्मगुरु दलाई लामा ने अपने रिटायर होने से इनकार कर उन अफ़वाहों पर लगाम लगा दिया जिसमें कहा जा रहा था कि दलाई लामा रिटायर होने की योजना बना रहे हैं.
धर्मशाला में दलाई लामा का कहना था, "चीनी जनता में मेरा हमेशा विश्वास रहा है और वो विश्वास कभी हिला नहीं है."
चीन बदल रहा है
उनका कहना था, "चीन बदल रहा है और ऐसे में तिब्बतियों को इस बदलाव से फ़ायदा उठाना चाहिए."
लेकिन उनका ये भी कहना था कि उनका विश्वास चीन की सरकार में और कम हो रहा है और आरोप लगाया कि चीन तिब्बत पर क़ब्ज़े करने के लिए ताक़त का इस्तेमाल कर रहा है.
उनका कहना था, "अगर हम अपने कार्रवाई में सतर्क नहीं हुए तो अगले 20 वर्षों में ख़तरा बढ़ने की आशंका है."
ग़ौरतलब है कि तिब्बत बहुत समय के लिए स्वायत्त रहा है जबकि चीन का कहना रहा है कि तिब्बत उनके देश का अटूट हिस्सा रहा है.
चीन ने 1950 में तिब्बत पर हमला करके उस पर नियंत्रण कर लिया था और दलाई लामा को भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी थी.