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शनिवार, 22 नवंबर, 2008 को 14:16 GMT तक के समाचार

दलाई लामा की 'मध्यमार्गी' नीति मंज़ूर

भारत में निर्वासन में रहने वाले तिब्बतियों ने एक बैठक के बाद चीन से पूर्ण स्वतंत्रता की जगह स्वायत्तता की माँग करने को सही नीति माना है.

तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा ने आज़ादी की जगह स्वायत्तता की माँग करने का निर्णय लिया था जिसे उन्होंने मध्यमार्गी नीति का नाम दिया है.

निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों का एक हिस्सा मानता है कि पूर्ण आज़ादी की माँग नहीं छोड़ी जानी चाहिए.

बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा ने जब 'निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री' सैमदोंग रिनपोचे से पूछा कि क्या तिब्बती युवा स्वतंत्रता की माँग छोड़ने को तैयार हो जाएँगे, तो उन्होंने कहा, "तिब्बती नौजवान मध्यमार्गी नीति से बिल्कुल सहमत हैं, 90 प्रतिशत नौजवान इसका समर्थन करते हैं."

रिनपोचे ने बैठक के बारे में जानकारी देते हुए कहा, "यही तय किया गया कि अभी के लिए मध्यमार्गी नीति ठीक है, अगर प्रगति नहीं हुई तो ऐसी ही बैठक करके आगे के लिए निर्णय लिया जाएगा."

उन्होंने कहा कि "तिब्बत का सपना कोई काल्पनिक सपना नहीं है, पहले जो साकार हो सकता है उसके लिए उपाय करना चाहिए".

चीन से बातचीत की दलाई लामा की नीति का भी इस बैठक में शामिल होने वाले नेताओं ने समर्थन किया लेकिन कहा कि बातचीत इसी पर निर्भर करेगी कि उसमें कितनी प्रगति होती है.

पिछले दिनों दलाई लामा ने ख़ुद ही कहा था कि चीन के साथ बातचीत में गतिरोध आ गया है.

विकल्प

धर्मशाला से बीबीसी संवाददाता का कहना है कि दलाई लामा अब भी निर्विवाद रूप से निर्वासित तिब्बतियों के नेता हैं लेकिन यह पहला मौका था जब बैठक में खुलकर अन्य विकल्पों पर चर्चा हुई.

इस बैठक में तय किया गया कि अगर चीन दलाई लामा की माँगों को मानने की दिशा में क़दम आगे नहीं बढ़ाता है तो स्वतंत्रता की माँग दोबारा उठाई जाए.

तिब्बती नेताओं ने यह निर्णय भी लिया कि दलाई लामा के दूत को तब तक बीजिंग नहीं भेजना चाहिए जब तक कि चीनी रवैए में साफ़ बदलाव नहीं दिखाई देता.

निर्वासित तिब्बती नेताओं के निर्णय को मानने के लिए दलाई लामा बाध्य नहीं हैं लेकिन उन्होंने कहा था कि वे अपने लोगों की राय जानना चाहते हैं.

रविवार को दलाई लामा इस मामले पर अपने विचार प्रकट करने वाले हैं.

चीन ने 1950 में तिब्बत पर हमला करके उस पर नियंत्रण कर लिया था और दलाई लामा को भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी थी.