बुधवार, 19 नवंबर, 2008 को 13:44 GMT तक के समाचार
संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थियों के लिए कार्यरत एजेंसी अफ़गानिस्तान के शरणार्थियों की वापसी के लिए समर्थन जुटाने के प्रयासों के तहत अफ़गान सरकार के साथ एक सम्मेलन आयोजित कर रही है.
शरणार्थियों की वापसी के लिए संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थियों के मामलों से जुड़ी संस्था यूएनएचसीआर अफ़ग़ान सरकार के विदेश मंत्रालय के साथ मिल कर काम करेगी.
एक अनुमान के अनुसार यूएनएचसीआर के प्रयास से वर्ष 2001 में तालेबान सरकार के पतन के बाद 50 लाख अफ़ग़ानी शरणार्थी देश वापस आए हैं लेकिन अब भी 30 लाख शरणार्थी पाकिस्तान और ईरान में हैं.
वापसी का दबाब
तालेबान के जाने के बाद अफ़ग़ान शरणार्थियों पर मेज़बान देशों की तरफ़ से वापसी का दबाब लगातार बढ़ता ही जा रहा है.
पचास लाख अफ़ग़ान शरणार्थीयों की वापसी का अर्थ अफ़ग़ानिस्तान की आबादी का 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा हुआ.
यूएनएचसीआर के प्रमुख एनटोनियों गूटेरस का कहना है, "कुछ शरणर्थी असुरक्षा कारणों से अपनी पुरानी जगह पर जाने से असमर्थ है. उन्हें उन इलाक़ों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है जहाँ कुछ भी नहीं है. उनके पास नौकरी नहीं है इसलिए स्थिति बहुत चुनौतीपूर्ण है."
शाह बीबी का ख़ानदान पाँच महीने पहले अफ़ग़ानिस्तान वापस आया है. एक शिविर में वो बहुत ख़राब परिस्थिति में रह रहे हैं जबकि सर्दी सर पर है.
वो कहती हैं, "मैं समझती थी कि हालात अच्छे होंगे, चिकित्सा सुविधाएँ होगीं, लेकिन इस तरह का कुछ भी नहीं दिख रहा है. हम लोग ज़मीन पर रह रहे हैं और खाना नहीं है."
यूएनएचसीआर का कहना है कि वापस आए 30 हज़ार से अधिक लोग टेंटों में रह रहे हैं.
वापस आए शरणार्थियों को देश के अंदर उन लोगों से नौकरी और संसाधनों के लिए मुक़ाबला करना पड़ रहा है जो ग़रीबी, असुरक्षा और फ़सल बर्बाद होने की वजह से विस्थापित होने पर मजबूर हुए थे.
कुछ विस्थापित हेरात प्रांत में रहते हैं. एक व्यक्ति ने बीबीसी को बताया, " ग़रीबी की वजह से लग रहा है जैसे हम पुराने ज़माने में रह रहे हैं. लड़ाई, मुसीबत, विस्थापन और सर्दी से हमारा मुक़ाबला है."
वो कहते हैं, "अगर आप के पास कुछ भी नहीं है तो आप को इलाक़ा छोड़ना पड़ेगा, मेरे सात महीने के बेटे की मौत हो गई है. मैं ख़ुद भी बुरी तरह से बीमार हूँ. "
गुटेरस का कहना है, "चुनौती ये है कि कैसे अफ़ग़ानी शरणार्थियों को उनके देश में सामान्य स्थिति में रखा जाए."
अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो अफ़ग़ानिस्तान से बाहर बड़े पैमाने पर विस्थापन का जोखिम है.