मंगलवार, 11 नवंबर, 2008 को 05:00 GMT तक के समाचार
विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता
अब तक तो कांग्रेस सलवा जुड़ुम के साथ थी लेकिन चुनाव का समय आया तो पार्टी ने इस मुद्दे से किनारा कर लिया है.
अब तक राज्य में कांग्रेस इस आंदोलन में खुलकर साथ दे रही थी और केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के गृहमंत्री शिवराज पाटिल इस आंदोलन की तारीफ़ करते रहे थे.
कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र में न तो सलवा जुड़ुम का ज़िक्र है और न नक्सली आंदोलन का.
छत्तीसगढ़ में आधे से अधिक ज़िले नक्सली आंदोलन से प्रभावित हैं और प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि नक्सली आंदोलन इस समय देश की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है.
राजनीतिक सहमति
सलवा जुड़ुम वो आंदोलन है जो तीन साल पहले बस्तर में नक्सलियों के ख़िलाफ़ शुरु हुआ. कहने को तो ये जनआंदोलन था लेकिन तीन सालों में प्रकाशित-प्रसारित ख़बरें गवाह हैं कि असल में ये सरकार का आंदोलन बन गया है. और राज्य की कांग्रेस कंधे से कंधा मिलाकर सरकार का साथ देती रही है.
केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार भी सलवा जुड़ुम आंदोलन की तारीफ़ करती रही है.
छत्तीसगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता और विश्लेषक सुदीप श्रीवास्तव इस तर्क से सहमत होते हैं कि नक्सल आंदोलन को ख़त्म करने के लिए देश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों में पहली बार एक अभूतपूर्व राजनीतिक सहमति बनी.
वे कहते हैं, "यह सहमति इसलिए अभूतपूर्व है क्योंकि पाँच साल नेता प्रतिपक्ष रहे महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में यह आंदोलन शुरु हुआ और राज्य की सरकार उसके पीछे चली. सुप्रीम कोर्ट में सलवा जुड़ुम पर जो याचिका है उस पर भी राज्य सरकार और केंद्र सरकार साथ साथ खड़ी हैं."
लेकिन एकाएक कांग्रेस ने सलवा जुड़ुम से पल्ला झाड़ लिया है. अब न कांग्रेस इसका समर्थन कर रही और न इसका विरोध.
कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र में न सलवा जुड़ुम का ज़िक्र है और न नक्सलवाद का.
तो क्या यह इतना छोटा मुद्दा है जब चाहा साथ रहे और जब चाहा चुप हो गए?
घोषणा पत्र समिति के अध्यक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम मानते हैं कि यह बड़ा मुद्दा था लेकिन राज्य के कांग्रेस नेता इस बारे में एकमत नहीं हो सके और यह पार्टी की चूक थी.
अरविंद नेताम ने कहा, "सलवा जुड़ुम को लेकर किसी नेता की अपनी राय हो सकती है इसके पक्ष में या विपक्ष में. लेकिन इतने बड़े आंदोलन को लेकर पार्टी की अपनी एक राय होनी चाहिए. जब यह आंदोलन शुरु हुआ तभी पार्टी को इस पर विचार करके एक राय क़ायम कर लेनी थी."
वे कहते हैं, "लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इस मुद्दे पर नेता एकमत नहीं हो सके."
ये सर्वविदित तथ्य है कि विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता रहे महेंद्र कर्मा ने ही सलवा जुड़ुम की शुरुआत की थी. लेकिन उनसे अब पूछें कि नक्सल आंदोलन और सलवा जुड़ुम पर उनकी राय क्या है तो वे सिद्धांत और परिभाषाओं की बात करने लगते हैं.
बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, "आतंकवाद के बारे में कांग्रेस की राय या प्रतिबद्धता जगज़ाहिर है. वो चाहे सांप्रदायिक आतंकवाद हो या राजनीतिक आतंकवाद कांग्रेस इसके ख़िलाफ़ है."
लेकिन राज्य कांग्रेस के सभी नेता नक्सलवाद को आतंकवाद नहीं मानते.
राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी की स्पष्ट राय रही है कि नक्सली मामले को क़ानून व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं सुलझाया जा सकता. उनका मानना रहा है कि ये सामाजिक-आर्थिक कारणों से पैदा हुई एक समस्या है.
महेंद्र कर्मा ने सहजता से स्वीकार भी कर लिया कि अजीत जोगी और उनकी राय एकदम अलग है.
कर्मा ने कहा, "सलवा जुड़ुम पर मेरी और अजीत जोगी जी की राय उत्तरी ध्रुव-दक्षिणी ध्रुव की तरह रही है."
वोट की चिंता
तीन सालों में सलवा जुड़ुम अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया.
मानवाधिकार संगठनों से इसे लेकर शोर मचाया. मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच गया और उसने भी सवाल उठाए. लेकिन ऐसा लगता है कि तब तक कांग्रेस को आदिवासियों की स्थिति का भान नहीं था.
अब कांग्रेस के नेताओं को आदिवासियों की दुर्दशा याद आने लगी है. कांग्रेस के कोषाध्यक्ष और छत्तीसगढ़ के ताक़तवर नेताओं में से एक मोतीलाल वोरा ने बीबीसी से कहा, "आदिवासियों की न गाये रहीं और न उनकी मुर्गियाँ क्योंकि वे तो सब कुछ को छोड़कर कैंपों में आ गए थे. अब कुछ लोगों को लग रहा है कि नक्सली तंग नहीं करेंगे तो वो गाँव वापस लौट गए हैं. लेकिन जो कैंप में हैं उनकी सुरक्षा कौन करेगा?"
मोतीलाल वोरा कहते हैं, "आदिवासियों के बीच भय का वातावरण हैं और उनको सुरक्षा नहीं मिल रही है इसलिए हमें लगता है कि यह सरकार नकारा है."
चुनाव की घोषणा से पहले जो पार्टी सरकार के साथ खड़ी थी अब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश मानने की बात कह रही है. मोतीलाल वोरा ने ख़ुद कहा कि कांग्रेस वही करेगी जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं.
तो क्या पूरा मामला चुनाव का ही है?
सुदीप श्रीवास्तव का कहना है कि कांग्रेस की यह दुविधा आदिवासियों के वोट की चिंता से उभरी हुई भी हो सकती है.
वे कहते हैं, "पार्टी के रुप में कांग्रेस कांग्रेस की दुविधा यह है कि वह आदिवासियों को हमेशा अपने क़रीब मानते आए हैं, और सलवा जुड़ुम का दुर्भाग्यजनक पहलू यह है कि चाहे नक्सली मारे जाएँ या सलवा जुड़ुम आंदोलनकारी, मारा आदिवासी ही जा रहा है."
वे कहते हैं, "जब आदिवासी ही मारे जा रहे हैं तो इसकी प्रतिक्रिया की आशंका में कांग्रेस के कुछ नेता कहते हैं सलवा जुड़ुम ग़लत है और चूंकि इसकी शुरुआत नेता प्रतिपक्ष ने की थी, एक पक्ष इस सही ठहराता है."
मुख्यमंत्री रमन सिंह ऐलान करते घूम रहे हैं कि सलवा जुड़ुम एक बड़ी सफलता है और भाजपा को इसका फ़ायदा भी मिलने वाला है.
सुदीप इसके कारणों का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि आदिवासियों के पार्टी से कट जाने जैसी समस्या भाजपा के सामने है भी नहीं.
उनका कहना है, "भाजपा सिद्धांत रुप में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ है और सलवा जुड़ुम से उसे ऐसा लगता है कि आदिवासी इलाक़ों में, जहाँ उसकी पैठ कभी थी नहीं अगर कोई विभाजन होता है तो एक पक्ष हमेशा उनकी ओर खड़ा होगा."
लेकिन कांग्रेस सलवा जुड़ुम के राजनीतिक लाभ को लेकर आश्वस्त नहीं है. तभी तो अरविंद नेताम ने कहा, "ये तो चुनावी नतीजे ही बताएँगे कि सलवा जुड़ुम का कोई राजनीतिक लाभ मिला या उसका नुक़सान हुआ."
ये सच है कि सलवा जुड़ुम राज्य का इकलौता मुद्दा नहीं है. आदिवासी इलाक़ों में भी अगर ये एक निर्णायक मुद्दा है तो भी कई और मुद्दे हैं जो आदिवासी मतों को प्रभावित करेंगे.
ऐसे में सलवा जुड़ुम पर चुप्पी साधने के कांग्रेस के निर्णय ने उसे वोट दिलाए या उसके वोट काटे इसका फ़ैसला परिणामों से ही ज़ाहिर होगा.