बुधवार, 29 अक्तूबर, 2008 को 03:58 GMT तक के समाचार
पाकिस्तान में बलूचिस्तान की प्रांतीय राजधानी क्वेटा के पास बुधवार की सुबह आए भीषण भूकंप में मारे जाने वालों की संख्या बढ़ कर 170 हो गई है.
रिएक्टर स्केल पर इस भूकंप की तीव्रता 6.5 मापी गई है.
पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की सीमा के पास स्थित इस इलाके में भूकंप के कारण कई लोग घायल हुए हैं और कई घर तबाह हो गए हैं.
समाचार एजेंसियों के मुताबिक स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि मृतकों की संख्या बढ़ भी सकती है. अधिकारियों के मुताबिक 500 घर पूरी तरह से तबाह हो गए हैं.
अधिकारियों ने बताया कि केवल एक गाँव में ही मरनेवालों की तादाद 80 के क़रीब है.
बताया जा रहा है कि पहला झटका स्थानीय समय के मुताबिक सुबह साढे चार बजे के क़रीब आया. यह इतना तीव्र नहीं था.
इसके बाद दूसरा झटका आधे घंटे के बाद महसूस किया गया जो कि ज़बरदस्त था. भूकंप का असर क्वेटा से 70 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में सर्वाधिक था.
भीषण भूकंप
यहाँ स्थित ज़्यारत शहर लगभग पूरी तरह से नष्ट हो गया है. मकान गिर गए हैं और लोग हताहत हुए हैं.
बलूचिस्तान पाकिस्तान के पिछड़े प्रांतों में है इसलिए यहाँ तेज़ी से राहत पहुँचा पाना संभव नहीं हो पाया है.
बताया जा रहा है कि अधिकतर मकान कच्चे थे और पूरी तरह से ढह गए हैं. कहीं-कहीं पर पूरा गांव ही तहस-नहस हो गया है.
साथ ही जिस इलाके में सर्वाधिक असर है वो पहाड़ी क्षेत्र है. ऐसे में वहाँ राहत और बचाव दस्तों को पहुँच पाने में मुश्किलें हो रही हैं.
बलूचिस्तान के जिस इलाके को भूकंप ने हिलाकर रख दिया है, वहाँ का मौसम इन दिनों सर्द है और ठंड के कारण लोगों को भूकंप के बाद मौसम की भी मार झेलनी पड़ रही है.
हज़ारों की तादाद में लोग बेघर हो गए हैं और बाहर कुछ कपड़ों के सहारे मौसम से लड़ रहे हैं.
तबाही से निपटने की तैयारी
पाकिस्तान में इससे पहले अक्टूबर, 2005 में भारत-पाक सीमा पर स्थित मुजफ़्फ़राबाद के इलाके में भी भूकंप आया था.
इस भूकंप में भारतीय कश्मीर के सैकड़ों लोग मारे गए थे जबकि मुजफ़्फ़राबाद में मरनेवालों की तादाद हज़ारों में थी. लाखों लोग इस भूकंप में प्रभावित हुए थे.
क्वेटा का इतिहास भी वर्ष 1935 में एक ऐसा भूकंप देख चुका है जिसने क्वेटा को लगभग पूरी तरह से तबाह कर दिया था.
वर्ष 1935 में आए भूकंप में 30 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी.
पर भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील पाकिस्तान और भारत के उत्तरी हिस्सों में इस चुनौती से निपटने की तैयारियों को लेकर हमेशा चिंता व्यक्त की जाती रही है.
कई विश्लेषकों और संगठनों का मानना है कि सरकारों का रुख़ आपदाओं से निपटने के प्रति अपेक्षित गंभीरता लिए हुए नहीं रहा है.