गुरुवार, 23 अक्तूबर, 2008 को 08:36 GMT तक के समाचार
सुशील झा,
बीबीसी संवाददाता, मुंबई से लौटकर
'लाइट रहेगा तभी तो हीरो दिखेगा, लाइट नहीं तो कुछ दिखेगा क्या...फिर आप बताओ न कितना इम्पोर्टेंट है अपना काम'.
ये कहना है विश्वनाथ का जो पिछले तीन साल से फ़िल्मों में लाइटमैन का काम करते हैं.
फ़िल्मों में जो भी शॉट दर्शक देखते हैं उसमें कई लोगों की भूमिका होती है लेकिन दर्शकों को लगता है कि सारा काम कैमरामैन ही करते हैं लेकिन आप किसी फ़िल्म के सेट पर जाइए तो पता चलता है कि कैमरामैन बिना लाइटमैन के पंगु होता है.
विश्वनाथ कहते हैं, "हमारा बॉस तो कैमरामैन का असिस्टेंट होता है. वो ही बताता है लाइट किधर चाहिए. कैसे लगनी है. अपने को हीरो हीरोईन से मतलब नहीं है. कैमरामैन अपना बॉस है क्योंकि शॉट उसी को लेना है".
यानी की हर शॉट से पहले बड़ी बड़ी लाइटें आगे पीछे करना, सेट सजाना, बल्ब की ज़रुरत हो तो वो लगाना ये सब लाईटमैन का काम होता है.
सेट पर सबसे अधिक शारीरिक मेहनत करते हुए अगर कोई दिखे तो आप समझ जाइए कि वो लाइटमैन ही होगा. ये बस उन कुछ मिनटों में काम नहीं करते जब शॉट लिया जाता है.
क़रीब पांच फ़िल्मों में कैमरामैन का काम कर चुके राजीव कहते हैं, "आप समझिए. बिना लाइटमैन के कैमरामैन कुछ नहीं कर सकता. मेरा पूरा शॉट इन्हीं पर निर्भर करता है. वो कितनी जल्दी मेरी बात समझता है और लाइटें फिट करता है इस पर एक एक शॉट निर्भर करता है".
लेकिन क्या लाईटमैन को किसी तरह उसके इतने महत्वपूर्ण काम के लिए पहचान मिलती है.
फ़िल्मों के सेटों पर कई सालों से काम कर रहे अशोक गुप्ता कहते हैं, "पहचान तो हीरो हीरोईन जैसा कभी नहीं मिलता है. लेकिन जैसे मैंने किसी कैमरामैन के साथ काम किया और उसको काम पसंद आया तो मुझे और अच्छा काम मिलता है लेकिन ये बहुत कठिन काम है".
वो कहते हैं, "आप ये सेट देखिए.. यहां बार बार ऊपर नीचे जाना पड़ता है. रिस्क है. लोग कभी कभी गिर जाते हैं तो मर भी जाते हैं. पैसा टाइम पर नहीं मिलता है. हम लोग बारह-बारह घंटे काम करते हैं लेकिन चेक मिलता है कभी कम मिलता है तो कभी चेक बाउंस हो जाता है".
अशोक जैसे कई और लोग इन सेटों पर पसीना बहाते हैं लेकिन उन्हें शिकायतें रहती हैं.
विश्वनाथ कहते हैं, "अभी देखो आप इधर स्पॉट ब्वॉय भी अपने को भाव नहीं देता. पानी चाय कोई नहीं पिलाता हमें. इतना मेहनत हमीं तो कर रहे हैं. डायरेक्टर तो कट बोलेगा ओके बोलेगा काम ख़त्म".
लेकिन ये लाइटमैन काम छोड़कर जाना भी नहीं चाहते.
अशोक कहते हैं, "हम तो कुछ और कर भी नहीं सकते. यही काम आता है. हमारी कोई ढंग की यूनियन भी नहीं है. थोड़ा पैसा वैसा ठीक से मिले तो अपना काम चलता रहेगा".
अशोक लंबे समय से हैं और इसी में खुश हैं लेकिन विश्वनाथ कुछ और करना चाहते हैं.
वो कहते हैं, "मेरे को तो कैमरामैन का चीफ़ असिस्टेंट बनना है पहले. तो थोड़ा इज्ज़त मिलेगा. अपुन पढ़ा लिखा नहीं है लेकिन काम सीखा है. अभी दो तीन साल और काम करेंगे तो बढ़िया काम मिलेगा ज़रुर".
कैमरामैन राजीव कहते हैं कि वो आम तौर पर उन्हीं लाइटमैन के साथ काम करना पसंद करते हैं जिनके साथ वो पहले काम कर चुके हैं. ऐसे में समय बचता है और शॉट्स भी अच्छे बन जाते हैं.
जिस फ़िल्म की शूटिंग में इन लाइटमैनों से मैं बात कर रहा था उसके प्रोड्यूसर नाम उजागर करना नहीं चाहते लेकिन वो मानते हैं कि लाइटमैनों का काम सबसे ख़तरनाक होता है.
वो बताते हैं कि शूटिंग में सबसे अधिक दुर्घटनाओं के शिकार यही लोग होते हैं क्योंकि सेटों पर ऊपर नीचे चढ़ कर भारी और मंहगी लाईटें लगाना, नीचे उतारना, उन्हें लाना ले जाना सब इन्हीं के ज़िम्मे है.
विश्वनाथ और अशोक से मेरी यह बातचीत कई बार बार रुक रुक कर हुई है क्योंकि एक जवाब देते देते ही शॉट खत्म और कैमरामैन के आदेश शुरु कि भई दूसरे शॉट की तैयारी करो.
पिछले दिनों बॉलीवुड के तकनीशियनों ने अपनी मांगों के लिए हड़ताल कर दी थी. इनमें लाइटमैन सबसे आगे थे क्योंकि शायद ये सबसे अधिक काम करने वालों में से हैं और इन्हें कभी इनकी असली क़ीमत नहीं मिल पाती है.