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मंगलवार, 21 अक्तूबर, 2008 को 17:08 GMT तक के समाचार

मृत्युदंड के बदले 20 साल की क़ैद

उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में पत्रकारिता के एक छात्र को इस्लाम की तौहीन करने के लिए सुनाए गए मृत्युदंड को 20 साल की क़ैद में बदल दिया गया है.

चौबीस साल के सैयद परवेज़ कमबख़्श को अक्तूबर 2007 में जेल भेजा गया था क्योंकि उन्होंने इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों पर इंटरनेट से कुछ आलेख डाउनलोड किए थे.

काबुल की एक अदालत ने मृत्युदंड को तो क़ैद की सज़ा में बदल दिया है लेकिन कमबख़्श के परिवार वाले संतुष्ट नहीं हैं.

उनका कहना है कि वो न्याय के लिए लड़ेंगे.

उम्मीद

कमबख़्श के शहर मज़ार-ए-शरीफ़ में एक अदालत ने महिलाओं के अधिकारों पर इंटरनेट से लेख डाउनलोड करने पर उन्हें मौत की सज़ा सुना दी थी.

उनके भाई सैयद याक़ूब इब्राहिमी ने कहा कि उन्हें बीस साल की सज़ा को भी ख़त्म कर दिए जाने की उम्मीद है.

उन्होंने कहा है कि निचली अदालत चरमपंथियों के प्रभाव में है.

इब्राहिमी ने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई की आलोचना की है और कहा है कि उन्होंने कमबख़्श को माफ़ी दिलवाने में अपने अधिकारों का उपयोग नहीं किया.

उन्होंने कहा है कि करज़ई कहते तो हैं कि अफ़ग़ानिस्तान एक जनतांत्रिक देश है लेकिन बोलने की आज़ादी के हक़ में उन्होंने कुछ नहीं किया है.

करज़ई की मुश्किल

कमबख़्श के मुक़द्दमे से अफ़ग़ानिस्तान में रूढ़िवादी इस्लामी वर्ग और राष्ट्रपति करज़ई के विदेशी पैरोकारों के बीच का संघर्ष भी सामने आ गया है.

करज़ई की समस्या ये है कि वो अफ़ग़ानिस्तान जैसे रूढ़िवादी इस्लामी समाज में विदेशी ताक़तों के सामने झुकते नज़र नहीं आना चाहते.

पिछले महीने क़ैद से ही बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कमबख़्श ने कहा कि मज़ार-ए-शरीफ़ के मुक़द्दमें में उन्हें अपना बचाव करने की इजाज़त नहीं दी गई.

उन्होंने कहा कि ये मुक़द्दमा सिर्फ़ पाँच मिनट में निपटा दिया गया.

काबुल में सुनवाई के बाद उनके भाई इब्राहिमी ने अफ़सोस जताया और कहा कि हमें आज कमबख़्श की रिहाई की उम्मीद थी.

उन्होंने कहा, “अदालतें अतिवादियों के प्रभाव में ऐसे फ़ैसले करती हैं. अब हम सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे कि इस मामले की दुबारा सुनवाई की जाए और कमबख़्श को तुरंत रिहा किया जाए.”