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बुधवार, 15 अक्तूबर, 2008 को 10:40 GMT तक के समाचार

अविनाश दत्त
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

मुसलमानों को रिझाने में जुटे दल

भारत के निर्वाचन आयोग ने पाँच राज्यों में विधानसभा चुनावों का औपचारिक बिगुल भले ही मंगलवार को बजाया लेकिन राजनीतिक दलों ने इन चुनावों और आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारियाँ और राजनितिक जोड़तोड़ पहले ही शुरु कर दी है.

इस पूरी प्रक्रिया में अहम है देश में मुस्लिम मतदाता को रिझाने की तीखी लड़ाई. विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाता को अपनी-अपनी खींचने का काम बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने ज़ोरशोर से शुरु कर दिया है.

पिछले कुछ महीनों में भारत में हुई चरमपंथी घटनाओं के बाद, सरकारी कारवाई से मुस्लिम समुदाय के अनेक सदस्य नाख़ुश हैं. कुछ पर्यवेक्षकों के अनुसार तो उत्तर प्रदेश में ये समदाय कांग्रेस और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन से कुछ दूर हटता भी दिखाई दे रहा है.

ऐसे में इस समुदाय के महत्वपूर्ण वोट को हासिल करने के लिए पार्टियों में होड़ मच गई है और मुस्लिम समुदाय के प्रभावशाली नेताओं के साथ नज़र आने की प्रक्रिया में भी तेज़ी आई है - फिर वह चाहे बसपा हो या सपा.

अहमद बुखारी का सम्मलेन

मंगलवार को दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी के नेतृत्व में कई इस्लामी संगठनों ने बैठक की और कई वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि उनकी मंशा यूपीऐ और कांग्रेस को समर्थन देने की नहीं हैं.

सम्मलेन में बोलते हुए जमीअत-उलेमा-ए-हिंद (अरशद) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा 'जिस वर्तमान स्थिति में मुसलमान ख़ुद को पाते हैं, उसके लिए केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल ज़िम्मेदार हैं.'

मदनी ने कहा, "जो नुकसान पचास सालों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल और इस तरह की तंज़ीमों ने मुसलमानों को नहीं पहुँचाया, वह आज की केंद्र सरकार के गृह मंत्री ने मुसलमानों पहुँचाया है."

मौजूद लोगों इस बात पर भारी आक्रोश जताया कि हालात ऐसे हो गए हैं की 'हर दाढ़ी-टोपी वाला मुसलमान शक की निगाह से देखा जाता है.

सम्मलेन के मुख्य आयोजक मौलाना अहमद बुखारी ने मुसलमानों से कहा कि वो अपने भविष्य का फ़ैसला ख़ुद करें. उन्होंने साफ़ तो नहीं कहा कि ये फ़ैसला किस तरह का होना चाहिए लेकिन इतना संकेत ज़रूर दिया कि वो मुस्लिम मतदाता को मायावती और कांग्रेस के समर्थन में जाता नहीं देखना चाहते.

सम्मेलन के दौरान समाजवादी पार्टी सांसद अबू आज़मी भी नज़र आए.

महत्वपूर्ण है कि पहले ही अपने पारंपरिक मुस्लिम समर्थकों को साथ रखने के मक़सद से समाजवादी पार्टी महासचिव अमर सिंह दिल्ली के जामिया नगर में मुस्लिम निवासियों से मुलाकात कर जामिया नगर मुठभेड़ में जाँच और गृह मंत्री शिवराज पाटिल की तीखी आलोचना कर चुके हैं.

मायावती भी मैदान में

इसके पहले सोमवार को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक ऐसा ही सम्मलेन हुआ था जिसका का विषय था - "मुस्लिम समुदाय की समस्याएँ: इसके कारण और निदान."

इस सम्मलेन को बहुजन समाज पार्टी के आम चनाव से पहले मुसलमान मतों को पार्टी की तरफ़ खींचने की दिशा में सबसे बड़े कदम के रूप में देखा गया.

सम्मलेन में मायावती ने मुसलमानों के लिए तोहफ़ों की झडी़ लगा दी. उन्होंने राज्य के मुस्लिम बहुल इलाक़ों में कई स्कूल कॉलेज खोलने की घोषणा की और लखनऊ में एक अरबी-फ़ारसी विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा भी कर दी.

मायावती ने उपस्थित लोगों को ये भी बताया की उन्होंने प्रधामंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर बाटला हाउस मुठभेड़ में जांच की मांग की है. उनका कहना था कि उनके प्रदेश में किसी भी मुसलमान को बिना ठोस सबूत परेशान नहीं किया जाएगा.

आरोप-प्रत्यारोप

बहुजन समाज पार्टी के महासचिव शहीद सिद्दीक़ी ने जामा मस्जिद के सम्मेलन पर इमाम बुखारी की आलोचना करते हुए कहा, "ये तो महज़ 'सौदेबाजी' है. इमाम बुखारी का मुस्लिम मतदाता से क्या संबंध? उनके कहने से जामा मस्जिद तक का वोटर तो हिलता नहीं."

कुछ महीने पहले तक समाजवादी पार्टी में रहे सिद्दीक़ी का कहना था, "आज मुसलमान जानता है कि रास्ता केवल मुसलमान और दलित के गठजोड़ से ही निकल सकता है."

उधर कांग्रेस के वरिष्ठ मुस्लिम नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सीके जाफ़र शरीफ़ मानते हैं कि हालात जैसे हैं, आने वाले 'चुनावों में कांग्रेस को उसका नुक़सान उठाना पड़ेगा.'

जाफ़र शरीफ कहते हैं, "ये बुरी किस्मत है हमारी कि हम उस प्रजातंत्र में ऐसी जगह खड़े हैं जहाँ हर कोई मुसलमान को मंडी का माल समझता है."