रविवार, 12 अक्तूबर, 2008 को 11:30 GMT तक के समाचार
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने गोधरा कांड की जाँच के लिए गठित दो आयोगों की अलग-अलग रिपोर्टों को पक्षपातपूर्ण रिपोर्टें कहा है. आयोग का दावा है कि सरकार गठित ऐसे आयोगों के पास कोई स्वतंत्रता नहीं होती.
गोधरा कांड पर नानावती और बनर्जी आयोग की रिपोर्टों का हवाला देते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एस राजेंद्र बाबू ने कहा कि किसी भी जाँच आयोग के लिए यह उचित नहीं कि वह पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट पेश करे क्योंकि इसके दूरगामी परिणाम होते हैं.
नई दिल्ली में समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में उन्होंने कहा, "सामान्य तौर पर एक चीज़ जो नहीं होनी चाहिए वो है पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट. लेकिन नानावती और बनर्जी, दोनों आयोगों ने पक्षपातपूर्ण रिपोर्टें दी हैं."
गुजरात सरकार ने नानावती आयोग का गठन किया था. आयोग ने गोधरा ट्रेन कांड की जाँच रिपोर्ट ने कहा है कि 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस मे लगी आग पूर्वनियोजित साज़िश का हिस्सा थी.
घटना
इस हादसे में अयोध्या से लौट रहे 58 कारसेवकों की मौत हो गई थी. इस घटना के बाद ही गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई थी, जिसमें 1000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. जिनमें अधिकतर मुसलमान थे.
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जीटी नानावती ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि न तो मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और न ही उनके कोई मंत्री या पुलिस अधिकारी ने गोधरा कांड में कोई भूमिका निभाई.
दूसरी ओर वर्ष 2004 में केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने जस्टिस यूसी बनर्जी आयोग का गठन किया था. बनर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में गोधरा ट्रेन कांड को हादसा बताया था.
बनर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि साबरमती एक्सप्रेस के कोच एस-6 में आग डब्बे से ही शुरू हुई थी और आग बाहर से नहीं लगाई गई थी. बनर्जी आयोग ने आग में किसी ज्वलनशील तरल पदार्थ के इस्तेमाल से भी पूरी तरह इनकार किया था.
सवाल
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एस राजेंद्र बाबू ने कहा कि ये दोनों आयोग मानवाधिकार आयोग की तरह स्वतंत्र नहीं थे. उन्होंने कहा, "दोनों आयोगों की सेवा शर्तें सरकार पर निर्भर थी. इसमें कई तरह की समस्या थी."
गोधरा कांड को एक असाधारण मामले की संज्ञा देते हुए जस्टिस एस राजेंद्र बाबू ने कहा कि इस मामले में पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट नहीं दी जानी चाहिए.
उन्होंने कहा, "चुनाव आ रहे हैं. मैं इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं चाहता. हमें इस मामले को एक स्वतंत्र और निष्पक्ष नज़रिए से देखना चाहिए, ताकि किसी को भी यह न लगे कि उनकी अनदेखी की गई है या किसी का पक्ष लिया गया है."
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि सभी जाँच आयोगों को ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इस तरह की घटनाओं में ग़रीब लोग ही सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं. उन्होंने कहा कि नंदीग्राम हो या गुजरात- दोनों जगह ग़रीब लोग की सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं.