ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने कश्मीर पर देश का रुख़ स्पष्ट करने के प्रयास में कहा है कि पाकिस्तान कश्मीर में 'बाहर के चरमपंथियों के आतंकवाद' के ख़िलाफ़ है. उन्होंने कश्मीरियों के भारत के विरुद्ध बल प्रयोग को उचित ठहराया है.
ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त वाजिद शम्सुल हसन हाल में देश के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए एक इंटरव्यू के बारे में स्पष्टीकरण दे रहे थे.
अख़बार के मुताबिक राष्ट्रपति ज़रदारी ने इंटरव्यू में भारत प्रशासित कश्मीर में इस्लामी चरमपंथियों को 'आतंकवादी' कहा था.
जहाँ पाकिस्तान के कुछ राजनीतिक धड़ों और भारत प्रशासित कश्मीर के कुछ अलगाववादी नेताओं ने इसकी निंदा की थी, वहीं भारत सरकार ने ज़रदारी के बयान का स्वागत करते हुए कहा था कि इससे दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर करने के प्रयासों को बल मिलेगा.
राष्ट्रपति ज़रदारी के विचारों के बारे में छपी रिपोर्ट के बाद भारत प्रशासित कश्मीर में बारामुला में सड़कों पर प्रदर्शन हुए थे और ज़रदारी के पुतले भी जलाए गए थे.
'सेना के ख़िलाफ बल प्रयोग उचित'
उच्चायुक्त हसन का कहना था कि राष्ट्रपति ज़रदारी 'कश्मीरी लोगों के अपने संघर्ष को और स्वशासन के अधिकार' को क्षति पहुँचाने की कोशिश नहीं कर रहे थे.
मीडिया को भेजे गए एक ई-मेल में उच्चायुक्त हसन ने कहा कि 'पाकिस्तान विदेशी चरमपंथियों की ओर से सीमापार घुसपैठ और कश्मीरियों के स्वतंत्रता संघर्ष को ध्वस्त किए जाने' के ख़िलाफ़ है.
ई-मेल में ये भी कहा गया है कि 'इन विदेशी चरमपंथियों ने कश्मीरियों के स्वतंत्रता के संघर्ष की मदद करने की जगह उसे क्षति पहुँचाई है.'
जब बीबीसी ने उच्चायुक्त हसन से पूछा कि क्या पाकिस्तान का रुख़ ये है कि कश्मीरी चरमपंथियों का भारतीय सेना के ख़िलाफ बल प्रयोग उचित है, तो उनका कहना था - 'जी, हाँ.'
ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेता और पाकिस्तान की सूचना मंत्री शैरी रहमान ने भी राष्ट्रपति ज़रदारी के विचार पर स्पष्टीकरण दिया था.
उनका कहना था, "राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया है कि पिछले 40 साल से पीपीपी का रुख़ रहा है कि कश्मीर का लक्ष्य और ख़ुद अपना भविष्य तय करने का संघर्ष न्यायसंगत है. उस नीति में कोई बदलाव नहीं है. कश्मीरियों के वैध अभिलाषा को उन्होंने कभी आतंकवाद नहीं कहा और न ही कभी कश्मीरी लोगों के दुख को ख़ारिज किया है."
लेकिन शैरी रहमान ने भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सेना के ख़िलाफ़ हिंसा का समर्थन नहीं किया.