शनिवार, 27 सितंबर, 2008 को 12:06 GMT तक के समाचार
तहलका पत्रिका ने गुजरात में फ़रवरी 2002 में गोधरा में ट्रेन में लगी आग पर आई नानावती रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग पूर्वनियोजित साज़िश नहीं थी.
शनिवार को तहलका ने ये दावा वर्ष 2007 में किए गए अपने स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर किया है.
तहलका ने गोधरा कांड और उसके बाद होने वाले दंगों के बारे में यह स्टिंग ऑपरेशन किया था जिसमें विभिन्न लोगों से बातचीत की गई थी और उसे ख़ुफ़िया तरीके से वीडियो में रिकॉर्ड किया गया था.
तहलका भारत में स्टिंग ऑपरेशन के लिए जाना जाता है और इसने अबतक कई स्टिंग ऑपरेशन किए हैं.
ग़ौरतलब है कि गोधरा ट्रेन कांड और उसके बाद हुए सांप्रदायिक दंगों की जाँच कर रहे नानावती आयोग ने अपनी रिपोर्ट के पहले हिस्से में कहा है कि साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग दुर्घटना नहीं बल्कि पूर्वनियोजित साज़िश थी.
नानावती आयोग की रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि कोच एस-6 को जलाने के लिए 140 लीटर पेट्रोल का इस्तेमाल किया गया था.
तहलका के प्रमुख संपादक तरुण तेजपाल ने शनिवार को दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "गोधरा ट्रेन कांड साज़िश नहीं थी इसलिए आम लोगों के हित में ये बताना ज़रूरी है कि गोधरा की घटना क्या थी."
स्टिंग ऑपरेशन
तरुण तेजपाल का कहना था कि तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में पेट्रोल पंप पर काम करने वाले रंजीत सिंह परमार ने क़बूल किया के मुख्य जाँच अधिकारी ने उसे और उसके एक साथी प्रभात सिंह को अलग-अलग पचास-पचास हज़ार रुपए दिए थे ताकि वे ये कहें कि मौलवी उमर ने यहाँ से पेट्रोल ख़रीदा था.
नानावती रिपोर्ट के अनुसार साबरमती एक्सप्रेस में सुनियोजित साज़िश के तहत जानबूझ कर आग लगाई गई थी.
जबकि तहलका का कहना है कि जिस दिन सुबह ट्रेन में आग लगी उस समय भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता बहाँ मौजूद नही था और पुलिस ने जिस व्यक्ति को प्रत्यक्षदर्शी बताया है वो व्यक्ति आग लगने के समय रेलवे स्टेशन पर नहीं था और अपने घर पर सो रहा था.
नानावती रिपोर्ट के अनुसार मौलवी उमर इस पूरे मामले के मास्टरमाइंड हैं जबकि तहलका ने पाया कि मौलवी उमर घटना के समय घटना स्थल पर मौजूद नहीं थे.
उल्लेखनीय रहे कि नानावती आयोग की रिपोर्ट का पहला हिस्सा गुरुवार को गुजरात विधानसभा में पेश किया गया.
वर्ष 2002 में 27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग के कारण 59 लोगों की मौत हो गई थी. जिसके बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे थे.
इन दंगों में एक हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे जिनमें अधिकतर मुसलमान थे.
वर्ष 2004 में रेल मंत्रालय ने गोधरा ट्रेन कांड की जाँच के लिए रिटायर्ड जस्टिस यूसी बैनर्जी के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी जिसने कहा था कि साबरमती ट्रेन के एस-6 डिब्बे में आग अंदर से ही लगी थी और एक हादसा नज़र आती है.