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शनिवार, 27 सितंबर, 2008 को 15:07 GMT तक के समाचार

पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

ये मिसाल हैं मानवता की, एकता की...

इन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि घटनास्थल पर किस संप्रदाय के लोग घायल हुए. वे कौन थे और उनके बारे में क्या सोचते थे. इन्हें मालूम रही बस एक बात की लोगों को मदद की ज़रूरत है और वही इन्होंने किया, साथ-साथ.

वाज़ुद्दीन महरौली के ही रहने वाले हैं और उस वक्त वार्ड नंबर आठ की उस गली में मौजूद थे, जिसमें शनिवार की दोपहर बम विस्फोट हुआ.

यहीं पटरी पर दुकान लगाते हैं प्रेमपाल श्रीवास्तव. उस वक्त बेटा खाना लेकर आया था और वो खाना खाने जा रहे थे.

तभी ज़ोर के एक धमाके ने रोज़ की रफ़्तार से चल रहे इस इलाके को हिलाकर रख दिया. हाथों से रोटी छूट गई. कुछ समझ नहीं आया कि क्या हुआ. आगे गली में धुँआ ही धुँआ भरा हुआ था.

प्रेमपाल और वाज़ुद्दीन को भी और लोगों की तरह यह समझते देर न लगी कि उनके इलाके में किसी ने विस्फोट करके माहौल बिगाड़ने की कोशिश की है.

दोनों ने एक दूसरे को देखा और तुरंत एक सहमति के साथ घटनास्थल की ओर लपके. लोग वहाँ से भाग रहे थे पर इन्होने तय किया कि घायलों को वहाँ से निकाला जाए.

'दर्दनाक था सबकुछ'

प्रेमपाल बताते हैं, "इलाके में रोज़ की तैनाती के मुताबिक दो पुलिस वाले मौजूद थे. उन्होंने थाने को ख़बर दी इन धमाकों की. पर पुलिस और राहत आने में कुछ समय तो लगना ही था सो हम खुद ही वहाँ से लोगों को निकालने लगे."

वाज़ुद्दीन बताते हैं, "हम लोगों ने घायलों को वहाँ से निकाला. जो गाड़ियाँ थीं उन्हीं में लोगों को डाला गया और अस्पताल की ओर लपके. अधिकतर एंबुलेंस तो लोगों को यहाँ से निकाल लेने के बाद पहुँचीं."

प्रेमपाल बताते हैं, "हमने पाँच-छह लोगों को निकालकर गाड़ियों में डाला. आधे घंटे बाद एंबुलेंस आना शुरू हुईं. एक पाँच साल के बच्चे की मौत हो गई थी. लोगों को कई जगहों पर चोटें आई थीं."

जिस इलाके में यह घटना हुई वहाँ ज़्यादातर परिवार निम्न मध्यमवर्गीय हैं. मिली हुई आबादी है यानी हिंदुओं और मुसलमानों की लगभग बराबर तादाद है और घर से मिले हुए हैं.

ऐसे में कोई भी ऐसा हमला माहौल बिगाड़ने का काम कर सकता था. पर अच्छी बात यह है कि वाज़ुद्दीन और प्रेमपाल जैसे लोगों ने इलाके में एकता की मिसाल भी क़ायम रखी और मानवता की भी.

पर दिलों में इनके भी चोट तो लगी ही है. घटना से कामकाज बंद हो गया. ये रोज़ कमाकर जीने वाले लोग हैं. जान पहचान के लोग भी घायल हुए हैं, उन्हें नुकसान हुआ हैं.

अब सवाल के घेरे में प्रशासन है. दिल्ली की पुलिस और ख़ुफ़िया तंत्र हैं. प्रेमपाल इस सवाल को उठाते हैं- यह सब क्या हो रहा है. क्या अब हम अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं रहे.

प्रेमपाल और वाज़ुद्दीन को प्रशासन से इस सवाल के जवाब का इंतज़ार रहेगा.