मंगलवार, 23 सितंबर, 2008 को 18:29 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद अदालत के बहुचर्चित प्रोविडेंट फंड घोटाले की जाँच सीबीआई को सौंप दी है.
अदालत ने ये आदेश ग़ाज़ियाबाद बार एसोसिएशन और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल संगठनों की जनहित याचिकाओं पर लंबी सुनवाई के बाद दिया है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले की सीबीआई जाँच पर अपनी सहमति काफ़ी हीला-हवाली के बाद दी थी.
इस घोटाले में 70 से ज़्यादा लोग जेल जा चुके हैं और उनके ख़िलाफ़ आरोप पत्र भी दाख़िल हो चुका है लेकिन घोटाले में कथित रूप से शामिल 36 जजों से अभी पूछताछ शुरु नहीं हो पाई है.
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने इससे पहले पुलिस के जजों से सीधे पूछताछ पर सहमति नहीं दी थी और उन्होंने सवालों की सूची अपने माध्यम से संबंधित जजों को भेजी थी.
उधर ग़ाज़ियाबाद के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक दीपक रतन ने राज्य सरकार को पत्र लिख कर मामला सीबीआई को देन की संस्तुति की थी क्योंकि उनका कहना था कि ज़िले की पुलिस इस मामले में विवेचना करने में सक्षम नहीं है.
कड़े निर्देश
लेकिन राज्य सरकार ने उनकी सिफ़ारिश पर ध्यान नहीं दिया था. इस वजह से पहले उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की गई थी.
उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले से संबंधित सारे दस्तावेज़ तीन अलग अलग जगहों पर रखे जाएँगे ताकि उनके गायब होने या हेराफेरी की कोई गुंजाइश ना रहे.
अदालत ने यह भी कहा कि जो जज रिटायर हो गए हैं, उनसे पूछताछ के लिए सीबीआई को किसी अनुमति की ज़रुरत नहीं है लेकिन जो वर्तमान जज हैं, सीबीआई अगर उनसे पूछताछ करती हैं तो अदालत से इसकी अनुमति लेनी पड़ेगी.
अदालत ने ये भी कहा कि वो किसी भी तरह उन जजों का पक्ष नहीं लेगी जिनकी वजह से न्यायपालिका की छवि ख़राब हुई है.
ग़ाज़ियाबाद बार एसोसिएशन के वरिष्ठ वकील नाहर सिंह यादव ने अदालत के आदेश पर संतोष व्यक्त किया है और अपेक्षा जताई है सीबीआई जल्द से जल्द इस मामले की जाँच पूरी कर सकेगी.