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शुक्रवार, 19 सितंबर, 2008 को 10:44 GMT तक के समाचार

पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

'रुक-रुक कर चल रही थीं गोलियाँ'

'नहीं, अब हम और कुछ नहीं बता सकते... हम बहुत घबराए हुए हैं. हम कुछ नहीं जानते. आप हमारा नाम जानकर क्या करोगे. हम इन लोगों से परिचित नहीं थे...'

मेरे हाथ में माइक और रिकॉर्डर देखकर पहले शब्द यही निकले रिज़वान और उनकी पत्नी के मुँह से.

रिज़वान और उनकी पत्नी अपनी चार बेटियों के साथ जिस मकान में रहते हैं, उसी मकान से लगी पाँच मंज़िला इमारत में शुक्रवार को दिल्ली पुलिस और संदिग्ध लोगों के बीच मुठभेड़ हुई.

रिज़वान बताते हैं, "हमारी चारों बच्चियाँ सुबह नाश्ता करके स्कूल चली गई थी. कुछ ही देर बाद हमें गोलियाँ चलने की आवाज़ सुनाई दी. पहले समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है पर बाद में पता चला कि गोली चल रही है."

गोली की आवाज़ बगल की इमारत से आ रही थी. गोलियों की आवाज़ की गूंज उनके घर में भी सुनाई दे रहे थे. घर के लोग सहमे हुए थे.

कुछ देर में लगता था कि सबकुछ अब थम गया है शायद पर फिर रुक-रुक कर गोलियाँ चलने की आवाज़ें आने लगती थी.

रिज़वान बताते हैं, "यह अंदाज़ा नहीं लग पा रहा था कि गोलियां दोनों ओर से चल रही हैं या एक ओर से. बस, हम आवाज़ सुन पा रहे थे. सुबह 9.30 या 10 बजे का वक्त रहा होगा जब यह सब शुरू हुआ."

ख़बर और डर

मोहल्ले में गोलियों का चलना और घर में लगे टीवी सेट पर दो संदिग्ध चरमपंथियों के मारे जाने की ख़बर से पूरा घर बुरी तरह से घबरा गया.

भारत के आम मुसलमान की मानसिकता पर आतंकवाद का शब्द क्या असर डालता है, इसका ख़ौफ़ साफ़ इस परिवार के चेहरे पर दिख रहा था.

इस दौरान मीडिया के लोग वहाँ पहुँचे. गोली चलने का सिलसिला बंद हुआ. पुलिस ने पूरे इलाके को कब्ज़े में ले लिया. रिज़वान की दो बेटियाँ पढ़ाई करके घर भी आ गई हैं.

पर दो बेटियाँ अभी भी घर नहीं पहुँची हैं. एक शायद रास्ते में है और दूसरी बेटी को उन्होंने फोन करके स्कूल में ही रुकने के लिए कह दिया है.

घर के लोगों को अब आगे की प्रक्रिया की चिंता है. पड़ोसी हैं, इसलिए हो सकता है पुलिस आए, उन्हें पूछताछ के लिए परेशान करे...वगैरह, वगैरह. ऐसी कई चिंताएं परिवार के लोगों के बीच है.

चमकते कैमरों के आगे इस परिवार की हिम्मत नाम बताने तक की नहीं हो रही थी. चलते-चलते घर के पुरुष ने मुझे बहुत धीरे से अपना नाम बताया...रिज़वान.