सोमवार, 15 सितंबर, 2008 को 11:26 GMT तक के समाचार
मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि भारत का शासन 2004 में कथित हत्या और बलात्कार की शिकार महिला को न्याय दिलाने में विफल रहा है.
तंगजम मनोरमा देवी को मणिपुर स्थित उनके घर से सुरक्षा बल के जवानों ने हिरासत में लिया था.
इसके कुछ ही घंटों के बाद गोलियों से छलनी हुआ उनका शव सड़क पर पड़ा मिला. मनोरमा की मौत की वजह से क्षेत्र में अनेक विरोध प्रदर्शन हुए थे.
अधिकारियों का कहना था कि मनोरमा के संबंध एक चरमपंथी गुट से था.
लेकिन उनके परिजनों ने इस आरोप से इंकार किया था.
ह्यूमन राइट्स वॉच की एक वरिष्ठ कार्यकर्ता मीनाक्षी गांगुली ने बीबीसी से कहा, "मनोरमा की मौत के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मणिपुर आए थे और इस मामले की जाँच का वायदा किया था. उन्होंने कहा था कि अपराधी को सज़ा दी जाएगी."
उन्होंने कहा, "मनमोहन सिंह ने अपना वायदा नहीं निभाया और मनोरमा को न्याय नहीं मिला."
अपराध बढ़े
राजधानी नई दिल्ली में जारी एक नई रिपोर्ट में 'द ह्यूमन राइट्स वॉच' ने कहा, "हत्या और संभावित बलात्कार के इस मामले में जिसे 2004 में आसाम राइफ़ल्स ने अंज़ाम दिया, मनोरमा देवी को अब तक न्याय नहीं मिला है."
मीनाक्षी गांगुली कहती हैं कि अगर अपराधियों को सज़ा मिलती तो ये अपराध रोकने का काम करती लेकिन न्याय के अभाव में अपराध बढ़ता जा रहा है.
उन्होंने कहा, "मनोरमा देवी की मौत के बाद सुरक्षा बलों के मानवाधिकार उल्लंघन के अनेक मामले सामने आए हैं."
रिपोर्ट में भारत की सरकार से अपील की गई है कि वह सेना, पैरामिलिटरी और पुलिस के उन लोगों को सज़ा दें जो मणिपुर में इस हत्या के ज़िम्मेदार हैं.
रिपोर्ट का कहना है कि भारत की सरकार सेना और पैरामिलिटरी बल की हिरासत के दौरान जाने वाली ज़्यादतियों को रोक पाने में विफल साबित हुई है.
मीनाक्षी गांगुली ने कहा, "सुरक्षा बल क़ानून का पालन नहीं करते और चरमपंथी होने का शक होने पर न्यायाधीश के सामने लाने की बजाय उन्हें मार डालते हैं."
अपराधियों का बचाव
उन्होंने कहा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना के नाम की नैतिकता के नाम पर राज्य सरकार इन लोगों का बचाव करती है. इससे मणिपुर के निवासियों के पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रहता.
मणिपुर में अनेक विद्रोही गुट काम कर रहे हैं जिनमें से कई राज्य की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं और कुछ स्वायत्त कबायली राज्य चाहते हैं.
चरमपंथियों से लड़ने के लिए राज्य में बड़ी संख्या में सेना और पारामिलिटरी बल तैनात हैं.
राज्य में तैनात इन बलों को सेना के विशेष कानून के तहत शक्ति मिली हुई है जिससे उन्हें सज़ा नहीं दी जा सकती.
मानवाधिकार गुट काफ़ी समय से इस कठोर क़ानून को समाप्त करने की माँग करता आ रहा है