रविवार, 14 सितंबर, 2008 को 06:11 GMT तक के समाचार
सुशील झा,
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
रविवार की एक आम सुबह लेकिन आज चीजें कुछ बदली बदली सी लगीं.
किसी भी धमाके के बाद शहर थोड़ा सहम जाता है लेकिन आज शहर नहीं फ़िज़ा कुछ सहमी हुई सी थी.
मेरे घर से कार्यालय की दूरी क़रीब सोलह किलोमीटर है और मैं लगभर हर रविवार कार्यालय आता हूं लेकिन आज ट्रैफिक भी कुछ थमा हुआ सा था.
सड़कों पर गाड़ियां रविवार के कारण शायद कम थीं लेकिन सरोजिनी नगर मार्केट के पास रविवार को खालीपन अच्छा नहीं लगा.
मैं लगभग एक ही रफ्तार से अपनी बाइक चलाता हूं और आमतौर पर बाकी गाड़ियां मुझे ओवरटेक कर लेती हैं लेकिन आज कोई गाड़ी आगे नहीं निकल रही थीं.
यहां तक कि ऑटोरिक्शा भी लगता था कि ट्रैफिक नियमों की पुस्तक के साथ चल रहे हैं.
आधे रास्ते में जहां लोग ताबड़तोड़ रास्ता पार करते हैं वहां कुछ लोग जेबरा क्रासिंग से ही रास्ता पार कर रहे थे.
पूरे रास्ते लाल पीली और नीली बत्तियों वाली गाड़ियां तेज़ चल रही थीं.
बाकी गाड़ियां न केवल धीरे चल रही थीं बल्कि हार्न भी नहीं बजा रही थीं. मुझे लग रहा था दिल्ली वालों को हो क्या गया है.
हां एक गाड़ी तेज़ी से आई और मुझे ओवरटेक करती हुई चली गई. नंबर देखा तो पता चला ये किसी दूतावास की गाड़ी थी दिल्ली वाले की नहीं.
आम तौर पर टीवी चैनलों पर धमाकों के बाद वाले दिन यही कहानी दिखती है कि जीवन पटरी पर आ गया है लेकिन ये दिल्ली वालों का आम जीवन नहीं था ये मैं अपने दिल्ली के अपने दस साल के अनुभव से कह सकता हूं.
एक लाचारी, बेबसी और विवशता सी दिख रही थी कि क्या करें. अपनी तरफ से क्या ऐसा करें कि हम बच सकें मुसीबतों से.
तब तक गृहमंत्री शिवराज पाटिल का घर आ चुका था और जैसा कि किसी बड़ी ख़बर के बाद होता है मीडिया के ओबी वैन्स खड़े थे और मीडियाकर्मी. ऐसा नज़ारा महीने में चार पाँच बार मैं ज़रुर देखता हूं.
यहां भी एक सन्नाटा सा था. कैमरामैन कैमरों के साथ थे लेकिन वो अफ़रा तफरी नहीं थी जो आम तौर पर होती है.
शायद सबके जे़हन में यही सवाल था .. आखिर हो क्या रहा है.
इस पते के आगे न जाने कितने पुलिसवाले दिखे क्योंकि अब मैं कार्यालय के इलाके़ यानी कनाट प्लेस पहुंच चुका था.
रेडलाइट पर रुका तो पाया कि एक पंक्ति में सभी गाड़ियां खड़ी हैं बिल्कुल शांत. तभी पीछे से किसी ने हार्न बजाया. देखा सफेद अंबेसडर थी जिस पर लाल बत्ती लगी थी.
मैंने गाड़ी साइड की तो अंबेसडर तेज़ी से निकल गई. मेरे साथ बाइक चला रहे एक व्यक्ति ने कार को घूरकर देखा मानो कह रहा हो कि पता नहीं ये लालबत्ती वाले नेता कब सुधरेंगे.
आधे एक घंटे में किसी शहर की मानसिकता पढ़ना आसान नहीं है लेकिन मैंने आज दिल्ली की हवा में जो महसूस किया वैसा पहले कभी नहीं किया था.
दिल्ली में धमाके पहले भी होते रहे हैं लेकिन शायद ये धमाके फ़िज़ा बदल देने वाले हैं.