गुरुवार, 11 सितंबर, 2008 को 06:52 GMT तक के समाचार
सुरेंद फुयाल
बीबीसी संवाददाता, काठमांडू
पूर्वी नेपाल में रहने वाले रामचंद्र कतुवाल आख़िरकार खुश हैं. खुश होने की उनके पास वजह भी है.
उनकी 24 शादियाँ असफल रही तो क्या हुआ, 49 वर्षीय कतुवाल की 25वीं पत्नी उनके यहाँ खुशियाँ लेकर आई हैं.
हाल ही में उन्होंने अपनी शादी की सातवीं सालगिरह मनाई है.
वे कहते हैं कि शारदा के साथ उनकी शादी, 'खुशियों का सफ़र' साबित हुई है.
कतुवाल हिमालय के पहाड़ियों में माल ढोकर किसी तरह अपना गुज़र बसर करते हैं. उनके पास कोई ज़मीन जायदाद नहीं है.
उनकी पहली शादी तब हुई जब वे 26 वर्ष के थे. लेकिन इसके बाद एक के बाद एक शादियाँ लगातार नाकाम होती चली गईं.
उनकी पहली बीवी अपने प्रेमी साथ चली गई. और फिर बाद की बीवियाँ भी उन्हें इसी तरह छोड़ती गईं.
वे कहते हैं, “मेरी दूसरी बीवी भी मुझे छोड़ गई और फिर तीसरी भी.”
कतुवाल कहते हैं कि 16 वर्षों के अंतराल मे उन्होंने जो शादियाँ कीं, उनमें से उन्हें अच्छी तरह नौ ही याद हैं.
खाई कसम
कतुवाल कहते हैं, "हाँ, जब 24वीं बीवी भी मुझे छोड़ गई तब मैंने निश्चय किया कि फिर कभी शादी नहीं करुँगा."
लेकिन सात वर्ष पहले 23 वर्षीय शारदा के साथ शादी होने पर उनकी यह प्रतिज्ञा टूट गई.
कतुवाल कहते हैं कि वे इतने खुश हैं कि उन्होंने फिर कभी शादी न करने की क़सम खाई है.
वो कहते हैं कि वे अब बच्चों की पढ़ाई लिखाई पर ध्यान देंगे.
ग़रीबी की मार झेल रहे कतुवाल का कहना है कि हो सकता है कि ग़रीबी के कारण ही उनकी बीवियाँ उन्हें छोड़ती गईं हों.
यह पूछने पर कि लगातार असफल होती शादियों के बाद भी उन्होंने शादी के बारे मे कैसे सोचा, उनका जवाब था, " बिना बीवी के भी कोई घर होता है भला. मुझे एक बीवी चाहिए थी."