शुक्रवार, 29 अगस्त, 2008 को 07:48 GMT तक के समाचार
श्रीलंका की सेना तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अब आर-पार की निर्णायक लड़ाई की तैयारी करती नज़र आ रही है.
इस ओर ताज़ा तैयारी में तमिल विद्रोही संगठन, एलटीटीई के प्रभाव वाले इलाकों में श्रीलंका सेना ने लोगों को चेतावनी देते हुए हवाईजहाज़ से कुछ पर्चे गिराए हैं.
इन पर्चों पर सरकार की ओर से नागरिकों से कहा गया है कि वे एलटीटीई के प्रभाव वाले इलाके को जल्द से जल्द छोड़कर सुरक्षित स्थानों को चले जाएं.
जानकार मानते हैं कि इस तरह श्रीलंका की सेना एलटीटीई के साथ अब आखिरी नतीजे तक पहुँचने वाली लड़ाई की तैयारी कर रही है.
उधर राहत एजेंसियों का अनुमान है कि अकेले किलिनोच्चि ज़िले में ही क़रीब एक लाख, 34 हज़ार लोग मौजूद है. किलिनोच्चि ज़िला तमिल विद्रोहियों के प्रशासनिक मुख्यालयों वाली जगह है.
इन आम लोगों में से आधे लोगों ने पिछले तीन महीनों के दौरान अपने घर खाली कर दिए हैं क्योंकि सेना की ओर से इस इलाके में सक्रिय अभियान चलाया जा रहा है.
पिछले दो दशकों से श्रीलंका सरकार और स्वायत्तता की मांग कर रहे तमिल विद्रोहियों के बीच भीषण संघर्ष जारी है और इस दौरान हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं.
'इलाका खाली करो'
स्थानीय लोगों के मुताबिक रात को एक हैलीकॉप्टर लोगों के घरों और बसेरों के ऊपर से गुज़रा और उससे हज़ारों की तादाद में पर्चे गिराए गए.
तमिल भाषा में लिखे इन पर्चों में लोगों से कहा गया है कि सेना की कार्रवाई में तमिल विद्रोहियों को करारी हार झेलनी पड़ रही है और ऐसे में आम लोगों को तमिल प्रभाव वाले इलाके से बाहर निकल जाना चाहिए.
श्रीलंका वायुसेना के एक प्रवक्ता कमांडर जनक ननयक्कर ने बताया की प्रायद्वीप के उत्तरी हिस्से में भी ऐसे पर्चे गिराए गए हैं. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि नागरिकों की स्थिति को लेकर लगातार चिंता बढ़ती जा रही है. सेना के सघन अभियान में नागरिक कम से कम प्रभावित हों, इसके लिए सेना इस तरह के चेतावनी जारी कर रही है.
ग़ौरतलब है कि सेना की कुछ अर्से पहले की कार्रवाइयों में आम लोगों की मौत के कई मामले सामने आए थे. इसकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय और राहत एजेंसियों ने निंदा की थी.
सरकार का यह भी आरोप है कि एलटीटीई के लड़ाके आम लोगों को सेना की कार्रवाई के ख़िलाफ़ ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.
पर श्रीलंका की संसद के एक सदस्य सुरेश प्रेमचंद्रन ने इस बारे में बताया कि लोग इसलिए प्रभावित इलाकों से नहीं निकल पा रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उन्हें बंदी बना लिया जाएगा, मार दिया जाएगा या शिविरों में रहना पड़ेगा.