शुक्रवार, 29 अगस्त, 2008 को 10:31 GMT तक के समाचार
मोहनलाल शर्मा
बीबीसी संवाददाता, बिहार के मधेपुरा से
ज़िंदगी की तलाश में सेना की बोट पर जब मैं सवार हुआ तो मेरा मकसद भी वही था कि किस तरह से दूर दराज के इलाकों में 10 फीट पानी के बीच फंसी उन महिलाओं और बच्चों को निकाला जाए जो भूखे-नंगे पाँच दिनों से वहीं फंसे हुए हैं.
मघेपुरा से पूर्णया जाने वाली सड़क आगे समुद्र में तब्दील हो जाती है.
मैंने मुरलीगंज के बाढ़ग्रस्त इलाके में राहत के काम में जुटी सेना की बोट में तैरना न जानने के बावजूद चढ़ने का फ़ैसला किया.
तैयारी बस इतनी थी कि एक लाइफ़ जैकेट सेना के जवानों ने मुझे भी दे दी.
दो नावों को जोड़कर बनाई गई इस बोट से एक बार में लगभग 50 लोगों की जान बचाई जा सकती थी. मोटरबोट पर चप्पुओं के साथ सेना के 10 जवान मुस्तैद थे.
रास्ता दिखाने के लिए हमारे साथ स्थानीय आदमी भी था क्योंकि सड़कों के बजाय पानी में रास्ता खोजना आसान काम नहीं था.
रास्ता खोजते खोजते लगभग एक घंटे में हमने 8-10 किलोमीटर की दूरी तय कर ली.
दूर तक पसरे पानी में तैरती नाव पर बैठकर चारों तरफ़ नज़र दौड़ाने पर लगा ही नहीं कि यहाँ अभी भी जीवन हो सकता है.
जीवन की डोर
आखिरकार मुराद पूरी हुई और दूर एक छप्पर पर चढ़कर बैठी महिलाएँ और बच्चे नज़र आए. कुछ पेड़ पर भी चढ़े हुए थे.
उन्होंने भी दूर से आती हमारी बोट को देखा तो हाथ हिला-हिलाकर अपने पास आने का इशारा करने लगे.
पास पहुँचे तो जवानों ने पानी में रस्सी फेंकी. रस्सी पकड़कर नाव की ओर बढ़ रही महिलाओं के हाथों में दुधमुहे बच्चे थे. रोते-बिलखते बच्चों को मैंने एक-एक कर नाव में उतारा.
कुछ जवान पानी में कूदे और बूढ़ी महिलाओं को कंधे पर ढो कर नाव तक ले आए.
अब इस बोट में 40 से ज़्यादा लोग थे. सबसे ज़्यादा थे 24 बच्चे. बाकी महिलाएँ और तीन पुरुष.
इनकी आंखों में बचने की चमक थी पर मेरे मन में सवाल था कि अब ये राहत शिविर या कहीं और अपना ठिकाना बनाएंगे मगर वहाँ की भी हालत कोई अच्छी नहीं, ज़्यादा दिन तक बीमारी फैलने से नहीं रुक सकती.
खुशी जवानों को भी थी कि उनका काम पूरा हुआ. इसलिए भी कि ये लोग समय रहते निकल पाए.
मगर सच यह भी है कि बोट भर जाने के बाद बचे हुए लोग आस भरी नज़रों से हमें देखते रहे, इस इंतज़ार में कि वापस कब आओगे.
मुझे लगा कि यहाँ पानी में ज़िंदगी और मौत के बीच का फासला सिर्फ़ एक नाव भर है.