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शुक्रवार, 29 अगस्त, 2008 को 21:11 GMT तक के समाचार

मोहनलाल शर्मा
बीबीसी संवाददाता, बिहार के सहरसा से

राहत शिविर में रहने का दर्द

तन पर कपड़े के नाम पर चंद चीथड़े, सिर पर अंगौछा, सामान के नाम पर छोटी सी गठरी. ये है एक बाढ़ पीड़ित की तस्वीर जिसका कोसी नदी सब कुछ छीन चुकी है.

ये सिर्फ़ एक आदमी या एक परिवार की दास्तान नहीं है बल्कि उन लाखों लोगों की है जिन्हें पानी ने सब कुछ छोड़ने पर मज़बूर कर दिया.

बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में सरकारी राहत शिविरों की तस्वीर ये है कि यहाँ रहने पर मज़बूर लाखों लोग ये नहीं जानते कि क्या वो कभी अपने घरों को लौट सकेंगे या नहीं.

अधिकतर सरकारी स्कूलों को शिविरों में तब्दील कर दिया गया है और इनमें रहने वालों की तादाद लाखों में है.

पुरुषों को अगर छोड़ दें तो शिविरों में हज़ारों महिलाएँ और दुधमुँहे बच्चे. इनमें से कई ऐसे बच्चे भी हैं जो बीमार हैं.

कुछ बच्चे तो चंद दिन पहले ही पैदा हुए हैं और धरती पर क़दम रखते ही जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

कुछ महिलाएँ गर्भवती हैं और उन्हें कभी भी प्रसव पीड़ा हो सकती है.

शौच की समस्या

सबसे बड़ी समस्या शौच की है. एक या दो शौचालय लेकिन इस्तेमाल करने वालों की तादाद हज़ारों में.

हर तरफ़ समंदर से नज़ारे के बीच कहीं कोई ऐसी जगह मुश्किल से नज़र आती है जहाँ लोग शौच के लिए जा सकें.

खाने के नाम पर है खिचड़ी और चिड़वा, पर ज़रूरी नहीं कि मिल ही पाए. दरअसल स्कूलों में बच्चों को दिया जाने वाला दोपहर का खाना ही राहत सामग्री में बदल दिया गया है.

न यहाँ वोट माँगने वाले नेता आते हैं और न ही सरकारी अधिकारी. अगर आ भी गए तो आश्वासन के अलावा कुछ नहीं. यहाँ ये भी कहना ग़लत होगा कि सरकार खाना नहीं दे रही पर जो दे रही है वो बेहद कम है.

पर इन सबके बीच स्थानीय लोग ही हैं जो बढ़-चढ़ कर अपनी क्षमता से ज़्यादा मदद कर रहे हैं.