सोमवार, 18 अगस्त, 2008 को 11:25 GMT तक के समाचार
क्रिस मॉरिस
बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
पिछले क़रीब एक दशक से परवेज़ मुशर्रफ़ पाकिस्तान की सबसे ताकतवर शख्सियत रहे हैं अब इस्तीफ़े के बाद भी पाकिस्तान उन्हें कई बातों के लिए याद रखने वाला है.
मुशर्रफ़ के इस्तीफ़े को आर्थिक और सामरिक चुनौतियों का सामना कर रहे पाकिस्तान में एक युग का अंत माना जा सकता है.
1999 में सैन्य तख्तापलट के बाद सत्ता में आए मुशर्रफ़ के कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान भारत के साथ युद्ध की स्थिति में आ चुका था हालांकि उसके बाद शांति प्रक्रिया शुरु हुई और आगे भी बढ़ी.
11 सितंबर के बाद मुशर्रफ़ ने अमरीका को पूरा समर्थन देने की घोषणा कर दी और आतंकवाद के ख़िलाफ अमरीकी लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
पाकिस्तानी समाज के कई तबकों के आधुनिकीकरण के लिए भी मुशर्रफ़ को श्रेय दिया जा सकता है.
लेकिन मुशर्रफ़ ने कभी विपक्ष को पनपने नहीं दिया, संस्थानों का सम्मान नहीं किया और अंत में उन्हें अपने ही फ़ैसलों का फल भुगतना पड़ा.
मुशर्रफ़ मानते थे कि वो ताकतवर हैं और वो कोई ग़लत क़दम नहीं उठा सकते लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.
हालांकि अब जब मुशर्रफ़ ने पद त्यागा है तो पाकिस्तान की हालत बहुत अच्छी भी नहीं कही जा सकती.
मुशर्रफ़ के एक समर्थक मुशाहिद हुसैन कहते हैं कि भविष्य में जब मुशर्रफ़ के बारे में बात होगी तो लोग संतुलित राय रखेंगे जो कि अब देखने को नहीं मिल रही है.
वो कहते हैं, ' उनके कार्यकाल में कुछ अच्छी चीज़ें भी हुई हैं और मुझे लगता है कि इतिहास की पुस्तकों में उन्हें याद रखा जाएगा.'
हालांकि पाकिस्तान के अन्य राजनेताओं की राय ऐसी नहीं है. ऐसे ही एक सांसद अनवर बेग कहते हैं, ' जहां तक लोकतंत्र की बात है मुझे नहीं लगता कि इतिहासकार कभी भी मुशर्रफ़ को माफ़ करेंगे. '
वो कहते हैं, ' मुशर्रफ़ ने चुनावों में मनमानी की, विपक्षी नेताओं को धमकाया और एक तानाशाह जैसा रवैया अपनाया. क्या इसके लिए कोई उन्हें याद रखेगा.'
मुशर्रफ़ के लिए सबसे बड़ा फ़ैसला रहा 11 सितंबर के बाद पूर्ण रुप से अमरीका का समर्थन करना जिसके बदले में पाकिस्तान को मदद के तौर पर क़रीब 10 अरब डॉलर मिले.
उनके इस फ़ैसले का कई लोगों ने समर्थन किया तो कई विरोधी भी बन गए. धीरे धीरे पूरे पाकिस्तान में अमरीका के साथ दोस्ती का विरोध होने लगा.
सैन्य मामलों के विशेषज्ञ तलत महमूद कहते हैं कि मुशर्रफ़ कभी भी आम जनता में यह बात नहीं समझा पाए कि ये लड़ाई उनके भले में है.
वो कहते हैं, ' मुशर्रफ़ ने कभी यह कोशिश नहीं कि हम अपने देश की भलाई के लिए लड़ रहे हैं. लोगों को लगने लगा कि ये लड़ाई अमरीका की है जिसे पाकिस्तान लड़ रहा है. इस कारण लोगों में उनकी छवि ख़राब हो गई.'
मुशर्रफ़ के लिए उत्तर पश्चिमी प्रांत हमेशा से परेशानी का सबब बना रहा और पिछले कुछ वर्षों में इन इलाक़ों में पाकिस्तानी प्रशासन की स्थिति अत्यंत कमज़ोर हो गई.
इतना ही नहीं भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते भी बहुत बेहतर नहीं रहे.
1999 में सैन्य प्रमुख के रुप में भारत के साथ करगिल संघर्ष शुरु करने का श्रेय भी मुशर्रफ़ को ही जाता है.
इतना ही नहीं 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव पैदा हुआ और युद्ध जैसी स्थिति बन गई.
2004 के बाद शांति प्रक्रिया शुरु तो हुई लेकिन अब मुशर्रफ़ के इस्तीफ़े के बाद शांति प्रक्रिया का क्या होगा, कहना मुश्किल है.
इतना ही नहीं पिछले दिनों काबुल में भारतीय दूतावास पर हुए हमले के लिए भी भारत पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी आईएसआई को ज़िम्मेदार मानता है.
मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए तो क़दम उठाए और वो शायद पहले बड़े नेता होंगे जो पद छोड़ रहे है लेकिन उन पर किसी प्रकार के भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा होगा.
मुशर्रफ़ ने मुख्य न्यायाधीश को बर्खास्त किया और खुद को राष्ट्रपति नियुक्त किया.
जानकार मानते हैं कि उन्होंने किसी भी संस्थान के महत्व को नहीं समझा और उनका अपमान ही किया जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ा.
मुशर्रफ़ चाहते थे कि पाकिस्तान में मध्य वर्ग मज़बूत हो.. ऐसा हुआ भी लेकिन इसी मध्य वर्ग ने मुशर्रफ़ के ख़िलाफ प्रदर्शनों में जम कर हिस्सा भी लिया और उन्हें पद छोड़ने के लिए मज़बूर किया.