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गुरुवार, 07 अगस्त, 2008 को 12:03 GMT तक के समाचार

बीनू जोशी
बीबीसी संवाददाता, जम्मू

समाधान की कोई राह नज़र नहीं आती

जम्मू के संगठनों और कश्मीरी अलगाववादी गुटों की हठधर्मिता के कारण पूरा राज्य एक ऐसे संकट में घिर गया है जिसका कोई समाधान फ़िलहाल नज़र नहीं आता.

सारे विवाद की शुरूआत तब हुई जब राज्य सरकार ने अमरनाथ मंदिर बोर्ड को बालताल चालीस हेक्टेयर ज़मीन आवंटित करने की घोषणा की ताकि वहाँ तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए अस्थायी तौर पर निर्माण कार्य किए जा सकें.

बालताल वह जगह है जहाँ से अमरनाथ यात्रा की शुरूआत होती है.

मंदिर बोर्ड को ज़मीन देने के फ़ैसले का कश्मीर के सभी अलगाववादी संगठनों ने पुरज़ोर विरोध किया, उदारवादी और कट्टरपंथी संगठन जिनमें हमेशा गहरी असहमति रहती है, इस मुद्दे पर एकजुट थे. उन्होंने यह कहते हुए भूमि आवंटन का विरोध किया कि "यह कश्मीर घाटी के मुसलमान बहुल चरित्र को बदलने की साज़िश है."

सैयद अली शाह गिलानी के नेतृत्व में कट्टरपंथी गुट ने और मीर वाइज़ उमर फ़ारूक़ की अगुआई में उदारवादी गुट ने इस फ़ैसले का विरोध किया और जून महीने से ही घाटी में इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शनों की शुरूआत हो गई.

प्रदर्शनों को ज़ोर पकड़ता देखकर कश्मीर घाटी की दो प्रमुख पार्टियाँ- पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और नेशनल कॉन्फ्रेंस-जो एक-दूसरे की घोर विरोधी रही हैं, इस मुद्दे पर एकमत हो गईं. अलगाववादियों और मुख्यधारा की दो अहम पार्टियों के एकजुट हो जाने से प्रदर्शन और तेज़ हो गए.

इसके बाद पीडीपी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली गुलाम नबी आज़ाद सरकार से समर्थन वापस ले लिया जबकि राज्यपाल ने एनएन वोरा ने सुझाव दिया कि मंदिर बोर्ड को ज़मीन की ज़रूरत नहीं है इसलिए ज़मीन राज्य सरकार वापस ले ले.

राज्यपाल के सुझाव के आधार पर मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने ज़मीन देने का फ़ैसला वापस लेने की घोषणा कर दी.

अब हिंदू बहुल जम्मू में प्रदर्शनों की शुरूआत हो गई, जिसका नेतृत्व तीस संगठनों के समूह अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति कर रही है, इन तीस संगठनों में भाजपा सहित धार्मिक,राजनीतिक और सामाजिक गुट शामिल हैं.

राजनीति

स्तंभकार डॉ जतिंदर सिंह कहते हैं, "पीडीपी का जम्मू में कोई आधार नहीं है, उन्होंने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का एजेंडा उससे छीन लेने की कोशिश की ताकि कश्मीर घाटी में उनका आधार और मज़बूत हो सके. इसके बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस में घबराहट फैली और उन्होंने भी इस मुद्दे का समर्थन करने का फ़ैसला किया, इसके बाद दोनों पार्टियों में होड़ लग गई."

गुलाम नबी आज़ाद ने इस्तीफ़ा दे दिया और जम्मू सुलगने लगा, राज्य में किसी राजनीतिक पार्टी के पास सरकार बनाने लायक़ समर्थन नहीं था इसलिए राज्यपाल शासन लागू कर दिया गया.

भाजपा के नेतृत्व में जम्मू में प्रदर्शनों ने उग्र रूप ले लिया. डॉ जतिंदर सिंह कहते हैं, "यह धार्मिक भावनाओं का मामला है और भाजपा को इसमें सीधा राजनीतिक लाभ दिख रहा है."

धीरे-धीरे यह आंदोलन भाजपा के हाथों से निकलकर एक जनआंदोलन में बदल गया. आंदोलन का आकार बढ़ता देखकर जम्मू कांग्रेस में घबराहट फैलने लगी और उन्होंने राज्यपाल पर आरोप लगाना शुरू किया कि उन्होंने सही क़दम नहीं उठाए.

इस मुद्दे पर जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच गहरी दरार खिंच गई है और स्थिति को नियंत्रित करने का कोई तरीक़ा नहीं दिख रहा है.