मंगलवार, 15 जुलाई, 2008 को 09:30 GMT तक के समाचार
अमरीका की एक मानवाधिकार संस्था 'ह्यूमन राइट्स वॉच' ने भारत सरकार से कहा है कि छत्तीसगढ़ में सलवा जुड़ुम कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई करनी चाहिए.
संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2005 के बाद छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों और सलवा जुड़ुम के कार्यकर्ताओं ने गाँववालों पर हमले किए, उनकी हत्याएँ कीं और उनके साथ बलात्कार भी किया.
नक्सलियों के हमलों से बचने के लिए वर्ष 2005 में सलवा जुड़ुम कार्यक्रम शुरु किया गया था. इसमें नागरिकों को लड़ाकों के रुप में चुनकर उन्हें हथियार दे दिए गए हैं.
सलवा जुडुम को छत्तीसगढ़ सरकार का समर्थन मिलने का आरोप लगता रहा है. लेकिन सरकार ने हमेशा इससे इनकार किया है.
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि पिछले 20 सालों में माओवादी हिंसा में पूरे भारत में तकरीबन छह हज़ार लोग मारे जा चुके हैं.
इस रिपोर्ट में नक्सलियों की हिंसा का भी ब्यौरा दिया गया है.
प्रत्यक्षदर्शियों के बयान
'ह्यूमन राइट्स वॉच' के अनुसार सलवा जुडुम कार्यकर्ताओं ने गाँववालों पर हमले किये, उनकी हत्याएँ कीं और बलात्कार किए.
संस्था का कहना है क यहाँ तक कि गाँववालों की झोपड़ियों में आग भी लगा दी ताकि उन पर दबाव बनाकर उन्हें सरकारी कैंप में रहने को मजबूर किया जा सके.
इस संगठन का कहना है कि उसके पास इस तरह के हमलों के 50 से ज़्यादा चश्मदीद गवाहों के बयान हैं जिनमें कहा गया है कि सुरक्षा बल छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और बीजापुर ज़िलों के 18 गाँवों में हमले में शामिल थे.
रिपोर्ट में दंतेवाड़ा के एक गाँव वाले के हवाले से कहा गया है, "जुडुम के लोग और पुलिस हमारे गाँव में आती है...वो गाँव के सरपंच और पुजारी को मारते हैं. वो लोगों को मारते हैं."
"उन लोगों के पास तीर कमान और लाठियाँ होती हैं पुलिस के पास बंदूकें होती हैं. उन्होंने हमारे गाँव में एक 20 साल की महिला से बलात्कार किया और चले गए."
नक्सली हिंसा
इसी के साथ 'ह्यूमन राइट्स वॉच' ने अपनी रिपोर्ट में नक्सली हिंसा का भी ज़िक्र किया है.
रिपोर्ट का ये भी कहा गया है कि नक्सलियों ने भी बम धमाके किए, लोगों का अपहरण किया, उन्हें मारा-पीटा और सलवा जुड़ुम का साथ देने वालों को फाँसी पर भी लटकाया गया.
इस मानवाधिकार संगठन ने नक्सलियों से अपील की है कि वो हर तरह के हमले बंद कर दें और कैंपों में रह रहे गाँववालों को मौक़ा दें कि वो अपने गाँवों में लौट सकें.
"सलवा जुड़ुम और नक्सलियों के बीच लगातार होती हिंसा में हज़ारों लोग छत्तीसगढ़ के सरकारी कैंपों में फँस कर रह गए हैं या फिर ये गाँववाले पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में जंगलों में रहने को मजबूर हैं."
लगातार बढ़ती हिंसा
मानवाधिकार संगठन की शोध टीम के सदस्य जो बेकर के अनुसार, "वैसे तो छत्तीसगढ़ सरकार सलवा जुड़ुम का समर्थन करने का इनकार करती आई है लेकिन दर्जनों चश्मदीदों का कहना है कि जिन गाँवों पर सलवा जुड़ुम के कार्यकर्ता हमला करते हैं उनमें राज्य की पुलिस के जवान शामिल रहते हैं. वो गाँवों में हत्याएँ करते हैं, लूटपाट करते हैं और घरों को आग लगा देते हैं."
2007 और 2008 के दौरान किए गए इस ज़मीनी शोध का नाम 'बीइंग न्यूट्रल इज़ ऑर बिगेस्ट क्राइम' रखा गया है.
"चार सप्ताह तक किए गए इस शोध के अनुसार इस हिंसा की वजह से बड़ी तादाद में लोग घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं. तकरीबन 10 हज़ार लोग दक्षिणी छत्तीसगढ़ में कैंपों में रहने के लिए मजबूर हैं या फिर ये लोग अपना गाँव छोड़कर पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में चले गए हैं."
रिपोर्ट के अनुसार हज़ारों परिवार अपनी ज़मीन गंवा चुके हैं, घर और रोज़गार गंवा चुके हैं और कैंपों में भीड़-भाड़ में रहने को मजबूर हैं.
रिपोर्ट में मांग की गई है कि छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि वो इन लोगों को दोबारा बसाने के लिए क़दम उठाए.
भारत के पूर्वी और मध्य क्षेत्र में माओवादी अपनी गतिविधियाँ चलाते हैं. माओवादियों का दावा है कि वो यहाँ रह रहे ग़रीब आदिवासियों और किसानों का नेतृत्व करते हैं.
वे अक्सर ऐसे क्षेत्रों में सक्रिय हैं जहाँ ग़रीबी है लेकिन वो इलाक़ा खनिज संपदा से भरपूर है.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी भारत के कई राज्यों में चल रही नक्सली गतिविधियों को देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बता चुके हैं.