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मंगलवार, 08 जुलाई, 2008 को 12:00 GMT तक के समाचार

प्यार कम तकरार ज़्यादा

क़रीब चार साल के बाद वामपंथी दलों और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के रिश्ते ख़त्म हो गए हैं. मुद्दा रहा भारत-अमरीका परमाणु समझौता.

लेकिन वर्ष 2004 में साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर एक हुए दोनों पक्षों के रिश्ते कोई अच्छे नहीं रहे हैं. मई 2004 में मनमोहन सिंह ने यूपीए सरकार का नेतृत्व संभाला था.

उसके बाद से कई मुद्दों पर वाम दल और सरकार आमने-सामने हुए. आइए नज़र डालते हैं ऐसे ही कुछ मुद्दों पर.

1.दूरसंचार क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाए जाने के प्रस्ताव का वाम दलों ने विरोध किया. सरकार निवेश की सीमा 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 फ़ीसदी करना चाहती थी. एक साल चले उठा-पटक के बावजूद यूपीए सरकार ने इस प्रस्ताव को लागू किया.

2. लेकिन बीमा और नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में वामपंथी दलों ने विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ने से सरकार को रोक दिया.

3.पेंशन फ़ंड रेगूलेटरी डेवलपमेंट ऑथॉरिटी विधेयक वामदलों के विरोध के कारण अभी तक लटका हुआ है. वाम दलों ने संसद में इस विधेयक को समर्थन देने से इनकार कर दिया था. इस विधेयक के तहत पेंशन फ़ंड को निजी कंपनियों को देना था और पेंशन की राशि को शेयर बाज़ार में लगाना था.

4. भारतीय बैंकों के शेयरों को बेचने और ज़्यादा से ज़्यादा विदेशी बैंकों को काम करने की अनुमति देने का सरकार का प्रस्ताव भी प्रस्ताव ही रहा क्योंकि सरकार के बैंकिंग सुधार के प्रस्ताव का वाम दलों ने विरोध किया.

5.वामदलों ने 2003 बिजली क़ानून के समीक्षा की मांग की, जो एनडीए सरकार ने बनाया था. हालाँकि यूपीए सरकार इसे लागू करने की कोशिश कर रही थी.

6. वामपंथी दल चाहते थे कि कर्मचारी भविष्य निधि पर ब्याज़ दर 9.5 प्रतिशत तय कर दी जाए लेकिन सरकार ने इसे 8.5 प्रतिशत ही रखने का फ़ैसला किया,

7.भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (भेल) में 10 प्रतिशत विनिवेश के फ़ैसले को सरकार ने दबाव में वापस लिया.

8. खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति देने के सरकार के प्रस्ताव पर भी वामदलों ने विरोध जताया.

9.हवाई अड्डों के आधुनिकीकरण के लिए प्राइवेट एजेंसियों को लाने के सरकार के फ़ैसले से वामदल काफ़ी नाराज़ थे. इस मामले पर दोनों पक्षों में लंबे समय तक उठा-पटक चली.

10. लेकिन सरकार और वामदलों के बीच सबसे ज़्यादा तकरार विदेश नीति को लेकर हुई. वामदल चाहते थे कि सरकार अमरीका के साथ किसी तरह की रणनीतिक साझेदारी न करे.

11.आख़िरकार अमरीका के साथ परमाणु समझौते को लागू करने की मनमोहन सिंह की कोशिश ने आग में घी का काम किया और वामपंथी दलों ने सरकार से समर्थन वापस लेने का फ़ैसला किया.