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शुक्रवार, 13 जून, 2008 को 23:30 GMT तक के समाचार

पूरी रात के बाद वकीलों की रैली ख़त्म

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दसियों हज़ार वकील ससंद भवन के बाहर रात भर प्रदर्शन करते रहे.

ये वकील और विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े हुए लोग देश के कई हिस्सों से यहाँ जमा हुए थे.

रैली को पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के एतेज़ाज़ अहसन के अलावा कई नेताओं ने संबोधित किया.

लेकिन जैसी कि उम्मीद की जा रही थी इसमें वकीलों की आगे की रणनीति की कोई घोषणा नहीं हुई.

रैली सुबह कोई पाँच बजे ख़त्म हुई.

वकीलों के जमावड़े को देखते हुए इस्लामाबाद में संसद भवन के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई थी लेकिन पाकिस्तान की नई सरकार ने पुलिस को आदेश दिए थे कि वह प्रदर्शनकारियों के साथ सहयोग करे.

राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवंबर 2007 में लगभग 60 जजों को निलंबित कर दिया था. इसमें मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी भी शामिल हैं.

इस फ़ैसले का वकीलों और राजनीतिक दलों ने विरोध किया था लेकिन संवाददाताओं का कहना है कि नई सरकार बनने के बाद भी वकीलों की बहाली के लिए कुछ फ़ैसला नहीं किया गया है.

फ़रवरी 2008 के चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों ने वादा किया कि इन वकीलों को फिर से बहाल किया जाएगा.

देश की बागडोर संभालने के लिए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और मुस्लिम लीग (नवाज़) के बीच जो गठबंधन हुआ उसमें भी जजों की फ़ौरन बहाली को प्रमुखता दी गई.

पर तीन महीने गुज़र जाने के बाद भी अभी तक यह नहीं किया जा सका है जिसे लेकर पाकिस्तान के वकीलों में व्यापक रोष है.

कोई घोषणा नहीं

इस्लामाबाद से बीबीसी के संवाददाता हारुन रशीद का कहना है कि देश के कई प्रांतों से चार दिनों के लांग-मार्च के बाद हज़ारों वकील यहाँ पहुँचे लोगों को इस बात पर हैरानी हुई कि नेताओं ने आगे की रणनीति पर कोई बात नहीं की.

उनका कहना है कि नवाज़ शरीफ़ ने यह ज़रुर कहा कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी उनके साथ हुए समझौते पर अमल क्यों नहीं कर रही है लेकिन ज़्यादातर वक़्त वे विपक्षी नेता की तरह राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को कोसते रहे.

दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एतेज़ाज़ अहसन ने भी कोई घोषणा नहीं की.

बाद में जब उनसे पूछा गया कि संसद को अनिश्चितकाल तक घेरने या आंदोलन को आगे बढ़ाने की संभावना देखी जा रही थी, तो उन्होंने कहा, "हमने यह तो समझ लिया कि हमारी ताक़त लांग-मार्च करने की पूरी है लेकिन संसद के सामने धरने के लिए जो संसाधन चाहिए वो हमारे पास नहीं हैं."

माना जा रहा था कि इस रैली के बाद परवेज़ मुशर्रफ़ की मुश्किलें बढ़ जाएँगीं लेकिन संवाददाताओं का कहना है कि रैली जिस तरह से ख़त्म हुई है उससे लगता नहीं कि इससे मुशर्रफ़ की स्थिति पर कोई विपरीत असर पड़ेगा.