गुरुवार, 12 जून, 2008 को 19:23 GMT तक के समाचार
नेपाल में प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला पर पद छोड़ने का दबाव बढ़ाने के लिए सरकार में शामिल सभी सात माओवादी मंत्रियों ने इस्तीफ़े दे दिए हैं.
इनमें पाँच कैबिनेट मंत्री हैं और दो राज्य मंत्री हैं.
फ़िलहाल ये इस्तीफ़े माओवादियों के नेता पुष्पकमल दहल यानी प्रचंड के पास हैं और मंत्रियों ने कहा है कि उचित समय पर वे ये इस्तीफ़े प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला के पास भिजवा दें.
फ़िलहाल माओवादियों ने गिरिजा प्रसाद कोइराला को पद छोड़ने के लिए तीन-चार दिनों का समय और दिया है.
माओवादी चाहते हैं कि गिरिजा प्रसाद कोइराला गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दें जिससे कि माओवादी नेता प्रचंड के नेतृत्व में नई सरकार का गठन किया जा सके.
विश्लेषक मानते हैं कि मंत्रियों के इस्तीफ़े कोइराला पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा लगता है लेकिन इसके बाद अगले एक दो दिनों में प्रधानमंत्री कोइराला को अपने अगले क़दम की घोषणा करनी पड़ सकती है.
उल्लेखनीय है कि गत 10 अप्रैल को हुए संविधान सभा के चुनाव में 601 सीटों में से 220 सीटें जीतकर माओवादी सबसे बड़ी पार्टी के रुप में उभरे थे. इसके बाद नेपाली कांग्रेस को 110 और सीपीएन-यूएमएल को 103 सीटें मिलीं थीं.
नई सरकार के लिए
माओवादी नेता पहले राष्ट्रपति बनने के इच्छुक थे लेकिन अब वे प्रधानमंत्री बनने को राज़ी हो गए हैं.
लेकिन इसका रास्ता तब साफ़ होगा जब गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री बने गिरिजा प्रसाद कोइराला अपने पद से इस्तीफ़ा दें.
माओवादी उन पर इस्तीफ़ा देने का दबाव बनाए हुए हैं लेकिन वे इसके लिए राज़ी नहीं हो रहे हैं.
कोइराला एक तकनीकी तर्क दे रहे हैं कि चूंकि माओवादियों के पास प्रधानमंत्री बनाने के लिए दो तिहाई बहुमत नहीं है इसलिए वे ख़ुद ही इस पद पर बने रह सकते हैं.
नेपाल में वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे का कहना है कि हालांकि माओवादियों के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि गिरिजा प्रसाद कोइराला अपना पद ही न छोड़ें.
उनका कहना है कि सबसे बड़ा दल होने के नाते सरकार का नेतृत्व करने की माओवादियों के माँग जायज़ दिखाई देती है.
वैसे माओवादी चाहते थे कि भविष्य में नेपाल में राष्ट्रपति शासन का मुखिया हो लेकिन संविधान के गठन से पहले इसकी संभावना नज़र नहीं आती.
दूसरी ओर नेपाली कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि नेपाल में वेस्टमिंस्टर यानी ब्रितानी पद्धति अपना ली जाए और प्रधानमंत्री ही शासन की बागडोर संभाले.
इसका फ़ैसला संविधान सभा को करना होगा.
राजा को चेतावनी
दूसरी ओर माओवादियों के दूसरे बड़े नेता बाबूराम भट्टाराई ने राजा ज्ञानेंद्र को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी है.
उन्होंने कहा, "गणतंत्र की स्थापना में राजा ज्ञानेंद्र कोई बाधा न पहुँचाए और क्रांतिविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने से बचें."
उन्होंने पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा, "यह गणराज्य की स्थापना का संक्रमण काल है और यह समय बहुत संवेदनशील है, ऐसे समय में हम नहीं चाहते कि राजा क्रांतिविरोधी तत्वों को हथियार की तरह इस्तेमाल करें."
उल्लेरखनीय है कि बुधवार की रात महल छोड़ते हुए राजा ज्ञानेंद्र ने अपने भावनापूर्ण भाषण में कहा था कि वे नेपाल को गणराज्य घोषित करने के संविधान सभा के फ़ैसले को स्वीकार करते हैं लेकिन वे नेपाल के हित के लिए काम करते रहेंगे.
बाबूराम भट्टाराई ने 2001 में राजमहल में हुई हत्याकांड की नए सिरे से जाँच करवाने की घोषणा भी की. उनका कहना था कि इसके लिए नई सरकार एक स्वतंत्र आयोग का गठन करेगी.
उनका कहना था कि नेपाली जनता जानना चाहती है कि राजमहल में क्या हुआ था.
वर्ष 2001 में पूर्व राजा बीरेंद्र और उनके परिवार की रहस्यमय परिस्थितियों में हत्या कर दी गई थी और इसके बाद राजा ज्ञानेंद्र ने राजगद्दी संभाली थी.
माओवादी नेता भट्टाराई ने कहा, "बुधवार को राजा ज्ञानेंद्र ने कहा था कि राज परिवार की हत्या में उनका कोई हाथ नहीं था, यदि यह सही है तो जाँच आयोग उन्हें निर्दोष साबित करने में सहयोग करेगा."
भट्टाराई से कहा है कि इस बात की भी जाँच करवाई जाएगी कि क्या पूर्व राजा बीरेंद्र का किसी विदेशी बैंक में कोई खाता था.