शुक्रवार, 30 मई, 2008 को 11:47 GMT तक के समाचार
अनुराधा प्रीतम
बीबीसी हिंदी
राजस्थान में गूजर समुदाय के लोग कई साल से अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की माँग कर रहे हैं और अब उनका आंदोलन भी ज़ोर पकड़ता जा रहा है. उनकी माँग है कि उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग से निकाल कर अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखा जाए.
क्या उनकी यह माँग मानी जा सकती है? इस विषय पर बीबीसी ने घुमंतू और निम्न घुमंतू जनजाति आयोग के प्रमुख बालाकृष्ण सिद्धराम रेनके से बातचीत की.
क्या गूजरों को घुमंतू जनजाति (डीनेटिफ़ाइड ट्राइब) की श्रेणी में रखा जा सकता है ?
ब्रितानी सरकार ने एक क़ानून 'क्रिमिनल ट्राइब एक्ट-1871' बनाया था. इसके आधार पर कुछ जनजाति के लोगों को पैदा होते है अपराधी मान लिया जाता था. इस क़ानून को 1952 में रद्द कर दिया गया. इसके बाद इस क़ानून के तहत जो जनजातियाँ नोटिफ़ाइड थीं, वह इससे बाहर कर दी गईं यानि की डीनोटीफ़ाइड कर दी गईं.
लेकिन गूजर कभी न नोटिफ़ाइड थे और न डीनोटिफ़ाइड. इस श्रेणी में लगभग 10 करोड़ लोग आते हैं, जिसमें बावरिया, सांसी, पाटदी और बंजारा जैसी जनजातियाँ शामिल हैं. लेकिन केवल उत्तर प्रदेश में ही गूजर इस श्रेणी में आते हैं ?
उत्तर प्रदेश के केवल कुछ ज़िलों में ही गूजर घुमंतू जनजाति की श्रेणी में आते हैं, पूरे उत्तर प्रदेश में नहीं.
क्या इसके आधार पर सिफ़ारिश की जा सकती है. आप अपने आयोग के माध्यम से केंद्र सरकार से गूजरों को इस श्रेणी में शामिल करने की सिफ़ारिश कर सकते हैं ?
किसी जाति को आरक्षण देने या किसी श्रेणी में शामिल करने का अधिकार राज्य सरकार का है. राज्य सरकार की सिफ़ारिश के बिना केंद्र सरकार इस पर विचार नहीं कर सकती है.
लेकिन राजस्थान सरकार ने गूजरों के लिए चोपड़ा आयोग का गठन किया.
राजस्थान अपने स्तर पर निर्णय लेने में पूरी तरह से समर्थ है. महाराष्ट्र में गोवारी समाज ने इसी तरह की माँग पर आंदोलन किया था, जिसमें नागपुर में 110 लोग मारे गए थे. इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनके लिए एक अलग श्रेणी बनाई, उन्हें आरक्षण दिया और विकास के लिए अलग से धनराशि दी थी.
क्या महाराष्ट्र को उदाहरण मानकर राजस्थान सरकार को भी उसी तरह काम करना चाहिए ?
अगर राजस्थान सरकार गूजरों की माँगों से सहमत हो जाती है तो वह अपने स्तर पर राजस्थान में गूजरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल कर सकती है.