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मंगलवार, 27 मई, 2008 को 20:19 GMT तक के समाचार

पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

केंद्र ने विधि मंत्रालय से राय माँगी

केंद्र सरकार ने गूजर आरक्षण मामले में राजस्थान की मुख्यमंत्री के पत्र पर अपना रुख़ स्पष्ट करने से पहले विधि मंत्रालय से इस बारे में राय मांगी है.

सूत्रों के मुताबिक मंगलवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक के दौरान इस मुद्दे पर भी चर्चा की गई और फिर इस मामले में कोई जल्दबाज़ी न करते हुए केंद्र सरकार ने विधि मंत्रालय को इस मामले की पैमाइश करके अपनी राय देने को कहा है.

पिछले लगभग एक सप्ताह से राजस्थान में गूजर समुदाय के लोग अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं.

इस दौरान हुई हिंसा और पुलिस फ़ायरिंग में अबतक 37 लोगों की जान जा चुकी है.

राज्य में गूजर आंदोलन के चलते बिगड़ते हालातों को देखते हुए सोमवार को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर इस मामले में प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाने और गूजरों को आरक्षण दिलाने की माँग की है.

मुख्यमंत्री के इसी पत्र पर मंगलवार को राजधानी दिल्ली में हुए कैबिनेट की बैठक में विचार विमर्श किया गया.

जानकारी मिली है कि अगले 1-2 दिनों में विधि मंत्रालय इस बारे में अपनी राय केंद्र सरकार के सामने रख सकता है जिसके बाद आधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार अपना पक्ष रख सकती है.

पत्र में मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की थी कि गूजरों को डीनोटीफ़ाइड श्रेणी में चार से छह प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए.

'राज्य सरकार की लापरवाही'

पर कांग्रेस पार्टी के युवा गूजर नेता सचिन पायलट वसुंधरा राजे के इस पत्र को ग़ैरज़िम्मेदाराना करार देते हुए कहते हैं कि इसमें मुख्यमंत्री ने कोई नई बात नहीं कही है और वही पत्र आगे बढ़ा दिया है जो पहले भी भेजा जाता रहा है.

उन्होंने कहा, "डीनोटीफ़ाइड श्रेणी में आरक्षण देने के लिए केंद्र से किसी सहायता की ज़रूरत ही नहीं होती और राज्य सरकार इसे अपने प्रभाव से लागू कर सकती है पर वसुंधरा अपने ऊपर से इस ज़िम्मेदारी को हटाने की कोशिश कर रही हैं."

सचिन पायलट ने कहा कि राज्य सरकार ने पिछले एक वर्ष के दौरान आंदोलन के प्रति जो लापरवाही का रुख़ अपनाया है, वो निंदनीय है. इस एक साल में 60 लोगों की मौत हो गई है जिनमें से अधिकतर पुलिस की गोली के शिकार हुए हैं. राज्य सरकार इसकी ज़िम्मेदारी क्यों नहीं लेती.

ग़ौरतलब है कि पिछले वर्ष मई से तेज हुई गूजर आंदोलन राज्य सरकार के लिए आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले गले की फाँस बनता जा रहा है.

पिछले वर्ष मई में 26 लोगों की मौत गूजर आंदोलन के दौरान हो गई थी. इस वर्ष भी पिछले एक सप्ताह के भीतर 37 लोग मारे जा चुके हैं.

उधर प्रशासन की गोलीबारी और गूजरों की मौत से क्षुब्ध आंदोलनकारियों ने अभी भी अपना आंदोलन जारी रखा है. गूजर मृतकों का अंतिम संस्कार भी नहीं कर रहे हैं और लाशों के साथ ही आंदोलन हो रहा है.