मंगलवार, 27 मई, 2008 को 12:11 GMT तक के समाचार
बर्मा की सैनिक सरकार ने कई वर्षों से नज़रबंद लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची की नज़रबंदी और बढ़ा दी है.
पुलिस ने आंग सान सू ची की नज़रबंदी बढ़ाने से पहले उनके कुछ समर्थकों को उस समय गिरफ़्तार कर लिया जब वे रंगून में सू ची के घर की तरफ़ मार्च कर रहे थे.
नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित आंग सान सू ची को मई 2003 से ही उनके घर में नज़रबंद किया हुआ है.
आंग सान सू ची की नज़रबंदी बढ़ाने का यह फ़ैसला कुछ ऐसे समय में आया है जब बर्मा की सैनिक सरकार दो मई 2008 को आए नरगिस तूफ़ान के प्रभावितों के सहायता के मामले में आलोचना का सामना कर रही है.
आंग सान सू ची की नज़रबंदी की अवधि और बढ़ाने के फ़ैसले से बर्मा की सरकार को अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना का सामना करना पड़ सकता है जो तूफ़ान से हुई तबाही से निपटने और प्रभावितों तक सहायता पहुँचाने के मामले में पहले से ही भारी आलोचना का सामना कर रही है.
उस तूफ़ान में क़रीब एक लाख लोग मारे जा चुके हैं और हज़ारों लापता हैं. इसके अलावा क़रीब 25 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हैं जिन्हें सहायता की तुरंत ज़रूरत है.
बर्मा की सैनिक सरकार पर आरोप लगे हैं कि उसने विदेशी सहायता को तूफ़ान प्रभावित लोगों तक नहीं पहुँचने दिया है.
आंग सान सू ची की नज़रबंदी भी बर्मा की सैनिक सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच मतभेदों की एक प्रमुख वजह रही है.
आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी यानी एनएलडी ने 1990 में हुए चुनावों में भारी जीत हासिल की थी लेकिन सेना ने उन्हें सरकार नहीं बनाने दी थी.
62 वर्षीय आंग सान सू ची ने पिछले क़रीब 18 वर्ष में से 12 वर्ष नज़रबंदी या जेल में गुज़ारे हैं.
संवाददाताओं ने पहले ही ऐसा अनुमान लगाया था कि आंग सान सू ची की नज़रबंदी अगले साल के लिए भी बढ़ाएगा. ग़ौरतलब है कि उनकी यह नज़रबंदी हर साल इसी तरह बढ़ाई जाती है.
आंग सान सू ची के समर्थकों का कहना है कि या तो उनकी नेता को क़ानूनी तौर पर रिहा किया जाए या फिर उन पर मुक़दमा चलाया जाए.
आंग सान सू ची की पार्टी ने बर्मा की सैनिक सरकार के इन दावों को ख़ारिज किया है कि हाल ही में हुए एक जनमत संग्रह में क़रीब 93 प्रतिशत मतदाताओं ने सेना समर्थित एक नए संविधान को मंज़ूरी दे दी है.
सू ची की पार्टी ने कहा है कि वह चुनाव सिर्फ़ दिखावा था क्योंकि वह न तो स्वतंत्र था और न ही निष्पक्ष. पार्टी ने आरोप लगाया है कि सैन्य अधिकारियों ने अपने समर्थन में वोट हासिल करने के लिए छल, बल, प्रताड़ना, धोखाधड़ी का सहारा लिया और मतदाताओं पर हर तरह का प्रभाव इस्तेमाल किया.