गुरुवार, 22 मई, 2008 को 08:10 GMT तक के समाचार
बीबीसी हिंदी संवाददाताओं का आकलन
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए सरकार ने अपने चार साल पूरे कर लिए हैं. लेकिन इन चार सालों में इस गठबंधन सरकार की क्या रहीं उपलब्धियाँ? सरकार ने क्या खोया, क्या पाया?
आइए डालते हैं एक नज़र.
ये पहला मौका है जब कांग्रेस पार्टी ने इतने लंबे समय तक गठबंधन सरकार की अगुआई की.
चार साल पहले एक अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम के बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने.
सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद लेने से मना कर दिया इसके बाद ही मनमोहन सिंह ने कमान संभाली.
यूपीए की टीम
गठबंधन को एक टीम के रूप में पेश किया गया. मनमोहन सिंह को एक कुशल अर्थशास्त्री के तौर पर पेश किया गया तो सोनिया गांधी की छवि एक जननेता की पेश की गई.
हालाँकि, कांग्रेस के नेताओं से ज़्यादा गठबंधन के नेताओं ने इस सरकार में वाहवाही लूटी है जिनमें रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव प्रमुख हैं.
इन चार सालों में सरकार ने रोज़गार गारंटी योजना, सूचना का अधिकार, किसानों के लिए 60 हज़ार करोड़ रुपए के कर्ज़ की माफ़ी की घोषणाएँ की.
वैसे सरकार इन दिनों महँगाई से परेशान भी है.
इन घोषणाओं के अलावा यूपीए सरकार ने दो और बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की- सच्चर आयोग का गठन और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण.
लेकिन दोनों ही क़दम लक्ष्य तक नहीं पहुँचे हैं और इन्हें पूरा करने के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है.
चुनावों में पटखनी
राजनीतिक मोर्चे पर अगर देखा जाए तो कांग्रेस ने आक्रामकता नहीं दिखाई.
चुनाव के मैदान में भी यूपीए को कई मैच हारने पड़े. कांग्रेस और उसके सहयोगियों को बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, केरल और मेघालय में सत्ता गँवानी पड़ी.
गुजरात में तो कांग्रेस ने बुरी तरह मात खाई.
यूपीए गठबंधन के विरोधी कह रहे हैं कि सरकार हर मोर्चे पर नाकामयाब रही है.
अपनी चौथी वर्षगांठ पर गठबंधन जहाँ अपने नज़रिए से अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करेगा वहीं विपक्षी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) भी सरकार का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखेगा.
ज़ाहिर है इसमें सरकार की आलोचना ही होगी.
अब क्या करेगी सरकार ?
चार साल पूरा होने के बाद अब यूपीए गठबंधन के पास एक साल और बचे हैं जब जनता उनका हिसाब किताब करेगी.
ऐसे में वो जनता के बीच अपना जनाधार बढ़ाने के साथ-साथ अपने मित्रों की संख्या बढ़ाने की कोशिश करेंगे.
वो शायद अपने 'मित्र' न बढ़ा पाएँ लेकिन ऐसे में वो ये भी कोशिश करेंगे कि उनके 'शत्रुओं' की संख्या कम हो जाए.
जनता के सामने लोकलुभावन घोषणाओं के अलावा अगर यूपीए सरकार के कामकाज पर नज़र डाली जाए तो राजनीतिक मोर्चे पर वो विफल ही नज़र आती है.
पिटे हुए योद्धा
कम से कम इन चार सालों के रिकॉर्ड को देखते हुए तो यही लगता है कि गठबंधन सरकार के पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिसके आधार पर वो अगले साल आम चुनाव लड़ सकेगी.
महँगाई तो एक बड़ा मुद्दा है ही, अन्य पहलुओं पर भी सरकार के सामने कई चुनौतियाँ हैं.
यूपीए ने अमरीका के साथ परमाणु क़रार को एक 'शोपीस डील' के तौर पर पेश किया.
लेकिन ये क़रार अब तक होता नज़र नहीं आता.
रोज़गार गारंटी योजना और अन्य पिछड़ा वर्ग को उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण जैसे मुद्दे यूपीए गठबंधन को फ़ायदा पहुँचा सकें ऐसा लगता नहीं.
चुनावी समर में यूपीए सरकार पहले से ही पिटे हुए योद्धा की मुद्रा में नज़र आती है.
शक्ति संतुलन
यूपीए सरकार में शक्ति के दो केंद्र रहे. एक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और दूसरा केंद्र सोनिया गांधी.
दोनों कभी एक दूसरे के विरोधी नहीं रहे. लेकिन दस जनपथ का ही दबदबा दिखा.
कांग्रेस की कोशिश रही कि दो केंद्र न नज़र आएं और इसमें वो कामयाब भी रही.
लेकिन कामयाब सत्ता हमेशा एक ही केंद्र से चल सकती है.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का राजनीतिक कद भी घटा. राजनीतिक तौर पर मनमोहन सिंह उतने कुशल नहीं हैं इसलिए वो प्रशासनिक मुद्दों पर ही बने हुए नज़र आए.
इसी वजह से यूपीए सरकार में हमेशा घटक दलों के नेता हावी रहे. चाहे वो करुणानिधि हों, लालू प्रसाद यादव हों या फिर रामविलास पासवान.