पंजाब में हुए एक शोध के मुताबिक खेती में कीटनाशकों के इस्तेमाल से लोगों के डीएनए को नुकसान पहुँचा होगा. शोध के मुताबिक खेत में काम कर रहे मजदूरों में कैंसर का कारण भी यही कीटनाशक हो सकते हैं.
पटियाला विश्वविद्यालय के इस शोध में मज़दूरों पर महीनों तक अध्ययन किया गया. यही कारण है कि इस शोध को अन्य अध्ययनों से बेहतर माना जा रहा है.
कई वर्षों से इस बात पर चिंता जताई जाती रही है कि खेतों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों से कैंसर जैसे रोग हो सकते हैं.
इस नए अध्ययन में पंजाब के किसानों के डीएनए में परिवर्तन पाया गया जिससे उन्हें कैंसर होने की संभावना जाती है.
विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर सतबीर कौर के मुताबिक इस शोध में पाया गया कि किसानों की उम्र, उनका शराब या सिगरेट का सेवन करना, इन सब बातों का डीएनए में होने वाले बदलाव से कोई ताल्लुक नहीं है.
प्रोफ़ेसर कौर कहती हैं कि डीएनए में होने वाले परिवर्तन का सबसे संभावित कारण खेतों में कीटनाशकों का छिड़काव ही हैं.
‘कोई संबंध नहीं’
उधर क्रॉप केयर एसोसिएशन के सलिल सहगल का कहना है कि किसानों को होने वाले कैंसर का खेतों में कीटनाशकों के इस्तेमाल से कोई ताल्लुक नहीं है.
वह कहते हैं, ‘आज की तारीख़ में खेतों में ऐसा कोई भी कीटनाशक इस्तेमाल नहीं होता है जिससे कैंसर हो सकता हो.’
सलिल सहगल कहते हैं कि किसान कीटनाशकों का इस्तेमाल हर सत्र में कुछ ही बार करते हैं, लेकिन किसान का कहना है कि उन्हें कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा बार करना पड़ता है ताकि फ़सल को नुकसान नहीं पहुँचे.
ऐसे वक्त जब खाद्य वस्तुओं की कीमतें तेज़ी से बढ़ रही है और नए फ़सलों की किस्मों से जिस पैदावार की उम्मीदें लगाई जा रही थीं, वो उम्मीदें पूरी नहीं हो पाई हैं, उस वक्त इस शोध का निष्कर्ष चिंता का विषय है.
पटियाला विश्वद्यालय के इस शोध से सवाल भी खड़े हुए हैं कि क्या गहन खेती ज़्यादा दिनों तक चल सकती है?