रविवार, 11 मई, 2008 को 10:15 GMT तक के समाचार
सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, झरिया से
झारखंड के झरिया इलाक़े में रविवार को आम नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने बंद रखा.
झरिया बंद के दौरान तमाम दुकानें बंद रहीं. ये बंद सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ बुलाया गया था.
इन लोगों का कहना है कि उन्हें किसी नई जगह पर बसाया जाए.
सरकार ने धनबाद के क़रीब ही लोगों को बसाने के लिए तक़रीबन 25 हज़ार घर भी बनाए हैं. लेकिन झरिया की पूरी आबादी के पुनर्वास के लिए कम से कम 50 हज़ार घरों की ज़रूरत है.
रविवार को बुलाए गए बंद के दौरान प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि सरकार उनके बारे में ज़रा भी गंभीर नहीं है.
दरअसल, पिछले सौ सालों से झरिया ज़मीन के नीचे ही नीचे सुलग रहा है. तक़रीबन 70 वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा है जहाँ ज़मीन के नीचे आग लगी हुई है.
झरिया का इलाक़ा धनबाद से तक़रीबन 20 किलोमीटर की दूरी पर है. इस इलाके में कभी बड़ी तादाद में कोयले की खदान हुआ करती थीं. लेकिन ज़मीन के नीचे लगी आग की वजह से खदानें धीरे-धीरे बंद होती गईं.
इस आग के वजह से ज़मीन के नीचे का पूरा कोयला जल कर राख हो चुका है और इस बात का ख़तरा है कि पूरा इलाक़ा कभी भी ज़मीन के अंदर धंस सकता है.
वैसे भी ज़मीन के अंदर आग सुलगती होने की वजह से वातावरण में कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी ज़हरीली गैस फैली रहती है.
ज़मीन के नीचे सुलगती आग की वजह से झरिया एक टापू की तरह हो गया है जिसके चारों तरफ़ ज़मीन के नीचे सिर्फ़ राख ही राख है.
ये शहर कभी भी ज़मीन के अंदर समा सकता है.
कैसे बुझेगी ये आग ?
ऐसा नहीं है कि इस आग को बुझाने की कोशिशें नहीं की गईं. केंद्रीय खनन शोध संस्थान के पूर्व निदेशक टीएन सिंह ने इस आग को बुझाने के लिए एक योजना भी सरकार के सामने रखी थी.
'लक्ष्मण रेखा' नाम की इस योजना के तहत ज़मीन के अंदर भारी मात्रा में रेत और पानी डाला जाना था. इन्हें 'बैरीकेड्स' कहा गया.
लेकिन सरकार ने इस प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया.
झरिया के लोगों का कहना है कि सरकार ने उनके साथ हमेशा अपेक्षापूर्ण रवैया रखा है.
लोगों का कहना है कि उन्होंने तो झरिया को उजड़ते हुए देखा है.
यहाँ ज़्यादातर घरों की दीवारों पर आप काफी चौड़ी-चौड़ी दरारें देख सकते हैं. यहाँ लोगों ने एक-एक करके रेलवे स्टेशनों को बंद होते हुए देखा है.
लोगों ने धनबाद से पाथरडी तक की 35 किलोमीटर लंबी लाइन को उखड़ते देखा है.
लोग कहते हैं, पहले रेल सेवाएं बंद हुईं, स्टेशन बंद हुए फिर यहाँ स्कूल और सिनेमा भी बंद हो गए.
कौन है ज़िम्मेदार ?
वैसे इस सब के लिए कोयला माफ़िया भी ज़िम्मेदार है.
दरअसल, जब भी ज़मीन के अंदर से कोयला निकाला जाता है तो उसके बाद कोयला निकलने के बाद खाली हुई जगह को रेत से भरा जाता है.
लेकिन कोयला माफ़िया ऐसा नहीं करते. कई बार खदानों में रेत भरने के नाम पर घोटाले हुए.
कई मामलों की जाँच सीबीआई ने की और कई कोयला माफ़ियाओं को इसमें पकड़ा भी गया.